क्या ऐसा समय आ गया है की अब खुलकर सत्ता मे बैठे लोगो को लाल क़िले से ऐलान कर देना चाहिए की मुसलमानों हाँ हम तुम्हारी ही जान के दुश्मन है हम तुम्हारे ही खून के प्यासे हैं शर्बत जैसा है खून तुम्हारा या गाने का रस जिसे पीकर हम अपनी सेहत का तंदरुस्त कर देना चाहते हैं… हम सेहत के साथ साथ इस ताज को भी बरकरार रखना चाहते हैं जिसका डर दिखाकर हमने यह ताज हासिल किया है, भूल गए क्या? हम सत्ता मे बैठे हैं तो इसके पीछे कौन सी विचारधारा है भूल गए क्या? हमारे चुनाव के समय कैसे हमने मुसलमानों के लिए जहर उगला , भूल गए वो वक़्त जब हमने सबके दिलों मे मुसलमानों को आतंकी बताया, जिसे सिनेमा से लेकर मीडिया तक ने मुसलमानों को तथाकथित आतंकी बनाने की ज़मीन तैयार की, उस ज़मीन को तैयार करने मे हमने साम दाम दंड भेद सबका इस्तेमाल किया, हमने पानी की तरह पैसा बहाया और आखिर मे आकर चुनाव जीत गए, अब तुम क्या चाहते हो हमने जिस बुनियाद पर चुनाव लड़कर जीता उस ही बुनियाद को उखाड़ कर फेंक दें, आने वाले कई सालों तक मुसलमानों से बड़ा मुद्दा हो ही नही सकता, और इस बार अगर हम मुसलमानों को छोड़ देंगे तो अगली बार हमे सत्ता मे कौन लेकर आएंगा, नही नही अगर हमने मुसलमानों की तरफ अपना रुख सही कर लिया तो अगली बार कुर्सी हुमसे छीन ली जाएगी…

कौन कहता है की सिर्फ पार्टियां सांप्रदायिक है लोग नहीं हैं, आज मे बिना झिझक यह बात कह रहा हूँ की सांप्रदायिकता बहुत ही निचले सतह तक पहुँच गयी है जहां राजीतिक पार्टियों का दखल सीधी तरह नहीं है वहाँ भी नफरत की आग भड़क रही है। अब ये ज़मीन मीडिया ने तैयार की है या पार्टियों ने इसका फैसला खुद कीजिये ज़मीन पर कांटे उग रहे है इस बात को स्वीकार कर लीजिये… एक के बाद एक घटना राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा जगह जगह से आ रही है जहां भीड़ ने अपना काम कर दिया… अब भी आँखों पर पर्दा डालकर कह दीजिये की कुछ ही लोग सांप्रदायिक है सब नही है हाँ मे भी कहता हूँ सब नही है लेकिन काफी हद्द तक हैं मेरे खुद ऐसे कई व्यक्तिगत अनुभव हैं जिसमे सांप्रदायिकता की बू आती है उन्हे यहाँ उजागर करना सही नही है वरना करता ज़रूर….

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