( प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अल्फाज ) जिसके अगले ही दिन एक और घटना हो गई …… करी नही हो गई ।
जिससे साफ़ तौर पर प्रधानमन्त्री के शब्दों का कोई मोल नजर नही आता साफ़ साफ़ अवहेलना की गई , आप कितना भी गांधीवादी बनते रहे कितना भी अहिंसात्मकता का पाठ पढ़ा ले ये भीड़ सुप्रीम कोर्ट है जो अपना फैसला पिछले 2 साल से सुनाने में ज्यादा डूब गई है । पहले हमारा भारत ऐसा नही था। लगातर ( सेक्युलर) भारत में ऐसी घटनाऐ देखने को मिल रही है । जिससे साफ़ तौर पर ये जाहिर हो रहा है की अब भारतीय समाज का एक बड़ा तबका एक बड़ी ( भीड़ ) मुस्लिम विरोधी होती नजर आ रही है जिसके परिणाम आपको लगातर कही न कही दिख रहे ही होंगे । जो हिंसात्मक्ता के स्तर को लांघ चुका है ।

जो अपना  जजमेंट साथ लिए है कौन दोषी कौन निर्दोष है किसको क्या जजमेंट सुनाना है किसको क्या सब जानता है वो । जिस तरीके से साल डेढ़ साल में जो अमानवीय कृत्य हिंसक लोगो का सामने वो भारतीय सामज की संस्कृति और तार्किक समाज को खत्म करने को तत्पर दिखाई दे रहा है।
एक तरफ ये हिंसा बढ़ती जा रही है और केवल इनके प्रति प्रवचन दिए जा रहे है दुःख जताया जा रहा है बस और कुछ नही ।
बात चाहे दादरी के अख़लाक़ की हो , पहलु खान की हो नजीब की हो ,हरयाणा के जुनैद की हो और अब झारखण्ड ( रामगढ़ ) के अलीमुद्दीन की हो, । इन सभी मामलो से इन तथाकथित गोरक्षको की शर्मनाक और दर्दनीय करतूते सामने आती दिख रही है । जिनका एक ही एजेंडा है कि माहोल खराब किया जाए ।


यह  फ़ोटो समाज की तस्वीरें सामने ला रही है जहाँ एक तरफ पी एम के बयान अपने आप में दुखद भावनाये जाहिर कर रहे है बस भावनाये …. जिसके प्रति जल्द से जल्द प्रतिक्रिया की जानी चाहिए उसके लिए कुछ पुलिस यूनिट को वहा तैनात कर दिया जाता है और समस्या हल हो जाती है………. क्यूँ।

उस भीड़ को समझाया जाय उनको गांधीवादी सिद्धान्तों का सिखाया जाये । परन्तु जजमेंट अपने हाथो में लिए इस भीड़ के पास आशंकाए होती है जिनके आधार पर ये सब घटित हो जाता है । सबूत न होते हुए भी ये सब काम हो जाते है भावनाओ में ।
एक बेहतर समाज के रूप उभरने वाले भारत की ये भी तस्वीरें है जिनका कोई आधार नही है केवल एक विचारधारा है जिसके तहत काम होता जा रहा है। जिससे भारतीय समाज की छवि जो बन रही है वह वैश्विक है ।

भारत बहुसंस्कृति और अपनी एकात्मकता के लिय जाना जाता है पर अब इस प्रकार की घटनाओ से जो धब्बे लगे है उनको नही मिटाया जा सकता है। जिससे एकात्मकता की बात तो दूर है हिंसा इतनी बढ़ गई है की जिसका कोई अंदाजा नही है ।
समाज में विशेष रूप से कटुता घुल गई जिसको वापस पुरानी अवस्था में नही लाया जा सकता है।
इस भीड़ को कोई अधिकार नही है की वो कानून को अपने हाथो में ले और इस प्रकार की हिंसा फैलाय।

लेखक- अय्युब मालिक

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