अरमानों भर के लिए मोहब्बत नहीं की थी।
उस रोज भी मैंने कोई शिकायत नहीं की थी।।

 

तेरे ज़ख्मों को भरने की एक कोशिश थी बस।
दोस्त मैंने तुझपर कोई इनायत नहीं की थी।।

 

तू खुदा बन भी जाता तो आखिर कैसे मेरा।
मैंने कभी तेरी इबादत भी तो नहीं की थी।।

 

यूँ मोहब्बत में मुझे कुचलने का सबब क्या था।
मैंने तो तुझसे कभी कोई बगावत नहीं की थी।।

मोहब्बत में सारे इलज़ाम मेरे ही सर क्यों हैं।
तुझे बहकाने की मैंने हिमाकत नहीं की थी।।

 

मुझे किस लिए तूने यूँ बंजारा बना दिया है।
मैंने मोहब्बत में कोई शरारत नहीं की थी।।

 

मैं मोहब्बत में तुझसे ज़िरह करता भी कैसे।
मैंने मोहब्बत में कभी वकालत नहीं की थी।।

 

मुझपर बदलने का इल्ज़ाम कैसे लगाया तूने।
मैंने खुद में कभी कोई सजावट नहीं की थी।।

 

साहिल तो मिल जाता मुझे, मुश्किल न था।
बस तेरे इंतजार में मैंने नदी पार नहीं की थी।।

 

दिल आज भी मानने को तैयार होता ही नहीं।
सब कहते हैं तूने कभी मोहब्बत नहीं की थी।।

अभि शायराना

2 COMMENTS

  1. ज़बरदस्त अभि !हर नया दिन तुम्हें परिपक्व करता है । यह एक पूर्ण कविता है । साधुवाद !

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