शुक्लाओं, तिवारियों, त्रिपाठियों, मिश्राओं आदि आदि तुम्हारा असहज होना जरूरी है. कौन किस जाति में पैदा होगा यह किसी की च्वाइस से नहीं हुआ. लेकिन ब्राह्मण जाति का ठप्पा लगने के साथ ही कई तरह के लाभ प्राप्त हुए. संसाधनों पर कब्जा और सामाजिक हैसियत प्राप्त हुआ. तुमने सिर्फ अपना पखाना ही धोया. दूसरे के घरों की लैंट्रीन की टंकी साफ करने का जिम्मा तुम्हारे हिस्से नहीं आया. कर्मकांड तुमने स्थापित किए. बियाह होगा तो पंडित की जरूरत. श्राद्ध होगा तो पंडित की जरूरत. जन्म होगा तब पंडीजी आएंगें. हिंदी और संस्कृत के ज्यादातर शिक्षक टीकाधारी क्यों होते हैं, बहुत देर समझ आया.

आज जब सदियों बाद कोई यह कहने की हिम्मत करने लगा कि I am a Great Chamar तो आंखें लाल हो गईं. कोई कहने लगा कि मैं मरी हुई गाय नहीं उठाऊंगा तो बेचैनी बढ़ गई. सर्वणों के अत्याचार के विरोध में एक संगठन भीम आर्मी आई तो उसे एंटी-नेशनल ब्रांड किया जाने लगा. मतलब क्या है- “मैं करूं तो स्वामी, तुम करो तो हरामी.”

ये भी दिलचस्प है न आज जो नए लोग ब्राह्मणवादियों की आलोचना लिख रहे हैं- उसे तुम दिलीप मंडल कहकर खारिज कर रहे हो. अरे सवर्णों, दिलीप मंडल के अलावा और कोई नाम क्यों नहीं सुझता तुम्हें? कारण कि विश्वविद्यालयों में आज भी तुम्हारा कब्जा है. एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व आज भी दयनीय स्थिति में है.

मालूम दिक्कत क्या है..ये सौ प्रतिशत सच है कि ब्राह्मण होना एक्सिडेंटल था जैसे किसी का चमार होना एक्सिडेंटल है पर तुम आज भी पिछड़ी जातियों को सामाजिक स्वीकृति देने को तैयार नहीं हो. आरक्षण से फ्रस्टेटेड हो. जब भी ब्राह्मणवादियों की आलोचना होती है तुम्हें अपने ऊपर हमला होते दिखता है. रे त्रिवेदियों, आज कितनी छटपटाहट हो रही है जब ब्राह्मणों के प्रति उग्रता दिखती है..इसलिए ब्राह्मणों अगर सभ्य समाज में इज्जत से जीना है तो भीतर के ब्राह्मणवाद को खत्म करो. नाम के टाइटल का शुक्ला, आचरण में नहीं झलकना चाहिए.

Rohin kumar

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here