मुस्लिम हुए तो क्या हुए जैसे पेड़ खजूर……

अव्वल तो इस्लाम किसी को समझ आता ही नहीं है खुद बहुत से मुस्लिम ही वाकिफ़ नहीं हैं कि इस्लाम क्या है? क्योंकि अगर इस्लाम का सही इल्म होता तो घर का झगड़ा बाहर ही नहीं आता जैसे तीन तलाक, मेहर, अज़ान या फतवेबाजी करने वाले मौलाना-मौलवी आलिम या ज़ालिम फ़तवे के नाम पर कौम को घुमाते नहीं, इस्लाम में टीवी हराम होते हुए भी टीवी पर नहीं आते खुदा के बंदे खुद में खुदा नहीं होते…..
धर्म के मामलें में आप कुछ भी लिखें लोगो के निशानें पर आ जाना लाज़मी है फिर आप अपने धर्म पर लिखें या किसी दूसरे धर्म पर आलोचनाओं से मुखातिब होना तय है लिहाज़ा बेहतर है कि आप खुद के धर्म पर ही लिख लीजिये जिसकी आपको बेहतर समझ हो सकती है साथ ही यह भी मुमकिन है कि कुछ गलत लिख देने पर भी आपको आपका समुदाय माफ़ कर दे। बुजुर्गों की बाते और धर्म का ज्ञान एक ही नदी के दो किनारे हैं ये आप पर निर्भर है कि आप किस किनारे से पानी पियेंगे। इस्लाम में जो बेहतर है वो है शिर्क नहीं करना मतलब मूर्ति पूजा नहीं करना ईमान की दीवारों पर सिर्फ अल्लाह लिखकर ज़हनी तौर पर अल्लाह के होने का इक़रार करना और पैगम्बर (नबी a massenger of God) के बताए तमाम कायदों को बेशर्त पूरा करना जिनके ताल्लुक से जिक्र है कि वह तमाम सुन्नते यानी तरीके अल्लाह की तरफ से मुस्लिमों के लिए दिए गए बस उन्हें पूरा करना उन पर अमल करना इस्लाम का ठोस वजूद है। “ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर रसूलल्लाह” ये है इस्लाम का पहला पाक कलमा ‘कलमा ए तैयबा’ इसके अनुवाद से ही आप समझ जाएंगे कि इस्लाम की बिसात क्या है? नींव क्या है? कायदे या कानून क्या है? क्यों वह शख्स मुस्लिमों में शामिल हो जाता है जो इस कलमे को पढ़कर इस पर यक़ीन करता है इसका अनुवाद है “मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई पूजने योग्य नहीं है और मुहम्मद सल्ललाहु अलैही वसल्लम अल्लाह के रसूल है” यहां बहस इस बात की नहीं है कि कौन इसे मानता है बहस ये है कि आप खुद क्यों इसे भूल गए हो? मुस्लिमों को जरूरत है कि वह फिर अपने रब की तरफ हो जाये और ईमान जगाए की अल्लाह है और वह जल्द ही मदद भेजेगा, किसी गैर मुस्लिम से अल्लाह के नाम पर खून खराबा करना इस्लाम नहीं सिखाता है इस्लाम कहता है कि आप गैर मुस्लिमो को इस्लाम की दावत दो ताकि वह आपके धर्म को जाने उसे अपना सकें। आज जो मुस्लिम समाज के युवा हैं अगर उनके मुताबिक इस्लाम को समझे तो इसमें कोई हर्ज नहीं के इस्लाम खून खराबे वाला मज़हब बनकर लोगो के सामने है, इस्लाम की वो विशेष बातें जो इस्लाम के दुनियाभर में फैल जाने की वजह थी अब वो वजह गम हो चुकीं हैं। इस्लाम मे खास है कि दिखे या नहीं दिखे लेकिन अल्लाह है और वो हमे देखता है का ईमान जिंदा होना लाज़मी है ताकि तुम बुरे कामो से बचे रहो, इस्लाम में अल्लाह ही वाहिद है एक है जिसकी इबादत होगी क्योंकि यह वो धर्म नहीं है जहां मामूली अदने इंसान भी भगवान तुल्य माने जाते हैं जिनके चरण छुए जाते हैं महिमामंडन किया जाता है और एक दिन वही भगवान तुल्य इंसान बलात्कार के इल्जाम में जेल जाता है नतीजा यह हुआ कि कर्म इंसान ने किया और बदनाम भगवान हुए, इस्लाम में अल्लाह की कोई तस्वीर नहीं है नजाने कब कौन मुल्ला वो तस्वीर का डर दिखाकर आपको ठगने लगे, इस्लाम में कोई शुद्र या अशुद्र् नहीं है यहां नमाज़ी और काफ़िर है, इस्लाम में कहीं भी पैगम्बर ने नहीं कहा कि वह खुदा हैं, या खुदा के अवतार हैं उन्होंने कहा मैं पहले अल्लाह का बंदा हूं फिर एक रसूल हूं, इस्लाम में मूर्ति पूजा इसलिए हराम है क्योंकि यहां धर्म व्यापार नहीं बल्कि ईमान है यक़ीन है। हालांकि मैं ख़िलाफ़ हूं उन मुस्लिमों के जो मज़ारों दरगाहों की ज़ियारत में वक़्त बिताते हैं असल में वही वो मूर्ख मुसलमान हैं जो इस्लाम के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि मेरे नज़रिये से उनमे और मूर्ति पूजा करने वालो में कोई भेद नहीं है एक वर्ग खड़े बुत की पूजा करता है जिसका ईमान है कि भगवान है जो इन मूर्तियों की शक्ल में साथ है और इनकी पूजा से उसे फायदा होता है वहीं दूसरा वर्ग (मुस्लिम वर्ग दरगाहों के चक्कर लगाने वाला) है जो बेजान जिस्म के दफन होने के बाद उस पर चबूतरा बनाकर पत्थर पूजता है भले ही फिर वह दलील देता है कि यह तो तरीका है अल्लाह से मिलने का दुआ पहुचाने का वगेरह वगेरह। जब अल्लाह के नबी ने कभी गुजरे नबियों की ज़ियारत नहीं कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं कि, इस्लाम की किसी असल किताब में नहीं लिखा अल्लाह कभी ज़मी पर आए, कुरान शरीफ में नहीं लिखा कि जो मर गए वो वली हो गए और अल्लाह के करीब हैं, कुरान कहता है कि अंत समय सबको उठना होगा सबका फैसला होगा तो यह कैसे मुमकिन है कि जिन कब्रो को तुम सुनने वाला बताते हो उन्हें अल्लाह से वरदान मिला है कि मरकर भी कब्रो में तुम्हारे लिये दुआ करेंगे, इस्लाम में ना अल्लाह की तस्वीर है ना शैतान की, ना फरिश्तों की ना जिन्नों, ना डर की कोई मिसाल है ना ईमान की तो तुम कौन से धर्म निभा रहे हो जिसमें दरगाह के नाम पर करोड़ो का पैसा कमाया जाता है। बाप दादा के विरासत में दिए इस्लाम को महज़ अपनी पहचान मत समझो अच्छा है कि इस्लाम सीखो समझो और तब कहो अल्लाहू अकबर ताकि गैर मुस्लिम भी अज़ान के साथ सुर मिलाकर कहे अल्लाह अकबर।

लव कुमार ताहिर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here