एक इतिहासकार के रूप में, मैंने हमेशा कोरेगांव के लड़ाई का जश्न एक समर्थक औपनिवेशिक मामले के रूप में पाया।
फिर भी, मैं घटना को एक उत्सव मनाने के लिए दलित कार्यकर्ताओं को दोष देने में सक्षम नहीं हूं।
तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान, 1 जनवरी 1818 को वास्तव में क्या हुआ था, इसको लेकर एक अच्छे पढ़ें-लिखे जानकार व्यक्ति भी अनजान हैं।

तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध

दो चरम सीमाएं हैं – एक है जो कोरेगांव को पेशवाओं के खिलाफ ‘महार वीरता ‘ की पुष्टि के रूप में देखता है। और दूसरा जो ‘पेशवा वीरता’ की कहानियों पर आधारित है जिसमें मराठों की सेना के 28,000 सैनिक ब्रिटिशों की लड़ाई में मारे गए थे!

क्या आप संभाजी भिडे और एकबोटे के बारे में जानते हैं?

आरएसएस-बीजेपी के दो लोगों, संभाजी भिडे और एकबोटे की भूमिका को अगर आप जानेंगे तो काफी आश्चर्यचकित होगा, जो अभी सबके सामने जगजाहिर हुआ है।
भूतपूर्व में हुए विभिन्न समारोह में भिडे और एकबोटे दलित हितैषी दिखने व सम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए ब्राह्मण व मुस्लिमों के खिलाफ नफरत की बाज़ार गर्म किया करते थे लेकिन वर्तमान में अचानक दलित विरोधी हो गए हैं।

2014 के चुनावों के दौरान, मोदी सांगली गए और भिडे के पैरों को छुआ!
असल में दलित Vs ब्राह्मण या दलित Vs मराठा लड़ाई मराठा इतिहास की पैदाइश नहीं हैं ।
बल्कि आरएसएस को दलित Vs मराठा-ऊपरी जाति संघर्ष के लिए कोरेगांव को एक उपजाऊ जमीन के रूप में देखा जाता है, जिससे एक दूसरे के खिलाफ दोनों पक्षों के मतभेद से पुरा लाभ संघ को मिल सकता है।

कोरेगांव की लड़ाई

1 जनवरी 1818 में कोरेगांव की लड़ाई ब्रिटिश जीत नहीं थी।
अंग्रेजों के पास महार, मंगेश, राजपूत, मुस्लिम, यहूदी और मराठा थे जो उनके लिए लड़ते थे जबकि पेशवा सेना में मुस्लिम अरब, उत्तर भारतीय क्षेत्र, मराठा, मंगेश और महार थे!
800 से अधिक ब्रिटिश-कंपनी के सैनिकों में से 275 लोग मारे गए तथा अन्य घायल हो गए या लापता हो गए। मृतकों में दो अधिकारी – सहायक-सर्जन विंगेट और लेफ्टिनेंट चाइस्कोल शामिल थे जिसे बाद में पेशवा के मुस्लिम अरब सैनिकों द्वारा मारा गया था।
ब्रिटिश पक्ष के पैदल सैनिकों में से 50 लोग मारे गए और 105 घायल हुए। तोपखाने में 12 लोग मारे गए थे और 8 घायल हुए थे। भारतीय मूल के मृत ब्रिटिश- सैनिकों में 22 महार, 16 मराठा, 8 राजपूत, 2 मुस्लिम और 1-2 यहूदी शामिल थे।
यानी लगभग 1/4 वा हिस्सा ब्रिटिश सेना का सफाया हुआ था।
ब्रिटिश अनुमानों के अनुसार 1800 भारतीय-पेशवा में से तीन या चार सौ की मौत हुई थी ….
अन्ततः बॉम्बे प्रेसीडेंसी के उच्च रैंकिंग ब्रिटिश अधिकारी, मौनस्टुआर्ट एल्फिन्स्टन ने कहा- ” कोरेगांव – पेशवा के लिए एक जीत!

ब्रिटिश चक्रव्यूह

कोरेगांव को जीवन के मुकाबले अधिक बड़ा बनाना मराठों को विभाजित करने के लिए ब्रिटिश चाल था – एकमात्र बल जो टिपू सुल्तान और मुगलों के बाद अंग्रेजों के लिए एक चुनौती के रूप में खड़ा था।
लेकिन ब्रिटिश सफल नहीं हुए। सन् 1857 में महार व मराठा ने ब्रिटिश के खिलाफ एक साथ लड़ाई लड़ी।
कोल्हापुर में 27 वें बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री का ब्रिटिश-विरोधी विद्रोह, और बेल्लगाम और धारवाड़ में 28 वें 29 वें बॉम्बे नेशनल इन्फैंट्री की ब्रिटिश-विरोधी विद्रोह का नेतृत्व महार, मंगेश और अवध के हिन्दुस्तानी सैनिकों ने किया।

सन् 15 अगस्त 1857 में बम्बई का आजाद मैदान गवाह है कि मराठा के साथ महार जाति ने भी कन्धे से कन्धा मिला कर ब्रिटिश के खिलाफ विद्रोह किया जिसमें निम्न जाति के मराठी मंगल गदिया व हिन्दुस्तानी मुसलमान सेय्यद हुसैन का बहुत बड़ा योगदान रहा ।

कोरेगांव और महत्वपूर्ण तब हो गया जब अंबेडकर ने 1 जनवरी 1927 को दौरा किया। तब से, कुछ स्थानीय तत्वों ने इस ‘घटना’ को जश्न के रूप में मनाना शुरू कर दिया ।
मैनें 2008 में कोरेगांव में आयोजित एक समारोह में भाग लिया। एक इतिहासकार के रुप में मैनें सच बोला । मैनें पेशवा सैनिकों की तारीफ़ भी किया लेकिन दलित संगठनों ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताया।
वर्तमान में हुए उपद्रव के लिए हिन्दूत्ववादी
तत्व जिम्मेदार है। जिन्होंने एक साजिश के तहत दलितों पर हमला किया। ये हिन्दूत्ववादी ब्रिटिश एजेंडों के बेटे हैं।
ये केवल एक हिन्दुत्वा प्लान के मुताबिक दलित-विरोधी हिन्सा का माहौल बनाना चाहते हैं। और 2019 चुनाव को ध्यान में रखते हुए जाति-द्वन्द्व को सम्प्रदायिक-द्वन्द्व बनाना चाहते हैं।

सही सोच रखने वाले ऊपरी जाति के सभी व्यक्तियों को यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि हिंदुत्ववादियों को पेशवाओं के प्रति कोई हमदर्दी नहीं है। नाना साहिब, बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र, कानपुर में 1857 का नेतृत्व किया। एक मुख्य मुस्लिम घुड़सवार उसके लिए लड़े।

मशहूर इतिहासकार अमरेश मिश्रा के अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद हैदराबाद स्थित उसमानिया यूनिवर्सिटी से दर्शनशात्र मे एम.फील कर रहे रिसर्च स्कॉलर व स्तम्भकार इंजीनियर अफ्फान नोमानी ने किया है 

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