मुस्लिम महिलाओं के हक के नये “मसीहा” भाजपाई और नरेन्द्र मोदी हैं , हिन्दू महिलाओं के वोट से चुनकर आई यह सरकार मुस्लिम महिलाओं के हक के लिए मरी जा रही है।

बेहतर तो यह होता कि मुसलमानों को उनके हाल पर छोड़कर यह सरकार देश के हिन्दुओं के लिए कुछ करती , सब हिन्दुओं के लिए ना सही तो उन 31% के लिए ही करती जिन्होंने धोखे और जुमलों में फँस कर इनको सत्ता दे दी।

मोदी और संघ मुस्लिम औरतों के हक की चिंता ना करें क्युंकि जब विभिन्न धर्म में औरतों के मिलने वाले हक और उसके इतिहास की समिक्षा होगी तो मुस्लिम महिलाओं के हक के लिए झूठे ही फड़फड़ा रहे ये नारंगी नंगे हो जाएंगे।

मेरा चैलेन्ज मोदी और भागवत स्विकार कर लें और बहस कर लें कि किस धर्म ने महिलाओं को सबसे “हक” दिया है।

माफ़ करिएगा बात कड़वी है परन्तु जब आपके घर लड़की पैदा होती थी तो क्या होता था ? अपशकुन होता था और उस समय कहते थे कि “डाईन ने जन्म लिया” और सदैव ही लोकलाज और भविष्य में पैदा होने वाली समस्याओं के डर से उसे जन्म लेते ही मार दिया जाता था।

शेष दुनिया में लड़की का जन्म होते ही उसे माँ की कोख से निकलते ही कब्र में दफन कर दिया जाता था और कहा जाता था कि “सबसे बेहतरीन दामाद कब्र” है , जो बच्चियाँ जन्म के समय किसी कारण से बच जातीं तो इनके बाप धोखे से पहाड़ पर ले जाते और धक्का देकर नीचे फेंक देते।

तब इन बच्चियों को “हक और ज़िन्दगी” दिलाने के लिए 1400 साल सबसे पहले हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ललम ने उस समाज से तमाम तकलीफें झेल कर कहा कि

“बेटियाँ खुदा की नेमत हैं”

जो तीन बेटी की अच्छी परवरिश करेगा वह जन्नत में दाखिल होगा , जो दो बेटी की अच्छी परवरिश करेगा वह भी जन्नत में दाखिल होगा और जिसने एक बेटी की अच्छी परवरिश की वह भी जन्नत में दाखिल होगा।

उन्होंने सिर्फ़ कहा ही नहीं बल्कि अपनी बेटी हज़रत फातिमा (रजि•) की शानदार परवरिश करके और उनका हक देकर अपनी उम्मत के साथ साथ दुनिया के सामने उदाहरण भी प्रस्तुत किया।

जब बच्चियाँ शिक्षा के बिना ही जीवन गुज़ार रहीं थीं और बड़ी हो रहीं थीं तब हमारे नबी ने उनको भी शिक्षा देने के लिए आह्वाहन किया , बेटे और बेटी के बीच भेदभाव को खत्म किया।

जब बेटियाँ बड़ी हुईं तो भोगी जाने के लिए मर्दों की सजाई मंडी में बैठाई जाने लगीं जहाँ मर्द पुरानी औरत बेचते और नयी औरत खरीद कर घर ले जाते तब तमाम ईंट पत्थर खा कर भी हमारे नबी ने मर्दों के सज़ाए इस बाज़ार का विरोध किया और कहा कि तुम्हें कोई औरत पसंद है तो उसकी मर्ज़ी से उसके साथ निकाह करो , उसे उसका हक देकर घर में इज़्ज़त के साथ ले जाओ।

सर पर पखाना पेशाब और शरीर पर ईंट पत्थर खा कर जान जोखिम में डालकर समाज के इन औरतों के सौदागरों से बचने के लिए भूखे प्यासे दिनों दिन पहाड़ों में छुपकर हमारे नबी ने ही तब औरतों को हक और इज़्ज़त दिलाई।

और आगे लड़ाईयों में जब मर्द सैनिक मारे जाते थे तो उनका परिवार भूख और गरीबी में चौराहे और औरतों के बाज़ार में पहुंच जाता था , तब तुम्हारे यहाँ विधवाओं को “रूपकंवर” बनाकर पति के साथ ही चिता पर ज़िन्दा जला दिया जाता था , तब हमारे नबी ने ऐसी विधवाओं बेवाओं से निकाह करने का आह्वाहन किया और कहा कि उनकी मर्ज़ी से उनका हक देकर दो निकाह तीन निकाह यहाँ तक कि चार निकाह करो जिससे उन विधवाओं की ज़िन्दगी भी इज़्ज़त से गुज़र सके।

जब किसी कारण कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को छोड़ देता तो उसका क्या होता ? समाज में घृणा की पात्र होती और पति द्वारा त्यागी परित्यक्ता कहलाती , उस समय हमारे नबी ने अपनी उम्र से 15 वर्ष बड़ी तलाक शुदा औरत के साथ विवाह करके अपनी उम्मत को यह दिखाया और बताया कि तलाक शुदा औरतों को भी अपना वैवाहिक जीवन पुनः जीने का हक है।

अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपनी उम्मत और दुनिया के सामने उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए समाज में घृणित समझी जाने वाली 6-7 (विधवा , तलाकशुदा , गुलाम , गरीब इत्यादि) तरह की महिलाओं से विवाह करके उन्होंने अपनी उम्मत को बताया कि देखो मैंने इनसे निकाह किया है तो तुम भी करो।

हमारे नबी की ऐसी शादियाँ आज मुसलमानों के लिए सुन्नत हैं और ऐसी किसी भी तरह की महिला से मुसलमान शादी करके उस सुन्नत को अदा करने के लिए खुशी खुशी तैय्यार रहते हैं।

जब बेटियाँ दूसरों को “दान” कर दी जातीं थीं तब हमारे नबी ने निकाह कराने के पहले उनसे रज़ामंदी की व्यवस्था की और उनको अपना वर चुनने का हक दिलाया।

बाप की संपत्ति में बेटियों को कभी किसी धर्म में हक नहीं दिया , हमारे नबी ने बेटियों को विवाह के बाद भी पिता की संपत्ती में हक दिलाया , यदि वैवाहिक जीवन कष्टपुर्ण है तो उनको पति से अलग होने का अधिकार “खुला” के रूप में दिलाया।

औरतों को अधिकार दिया कि यदि उनका पति एक तय अवधि से अधिक समय से लापता या गायब है तो वह दूसरा विवाह करने के लिए स्वतंत्र है , यदि पति उसका खर्च नहीं दे पाता , शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं कर पाता तो भी वह दूसरा विवाह करने के लिए स्वतंत्र हैं।

औरतों को मर्दों की भूखी आँखों से बचाने के लिए हिजाब और पर्दे की व्यवस्था दी तो मर्दों को किसी गैरमहरम औरत को देखते ही नज़र नीचे करने का हुक्म दिया।

जूए में पत्नी को हारने का इतिहास रखने वाले मोदी जी , मुस्लिम महिलाओं को हक और अधिकार आज से 1400 साल पहले हमारे नबी सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम हज़रत मुहम्मद दिला गये हैं , बेहतर होता कि इनमें से एक अधिकार देश की एक महिला “जशोदाबेन” को दिला दीजिए।

देश और जशोदा बेन आपकी आभारी रहेंगी।
Written by Mohd zahid

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