जैसे सब “खेल” हो? जैसे खेल खेला जा रहा हो? या सब कुछ प्रायोजित हो? या प्लानिंग हो? या फिर मर्ज़ी हो? इन सब बातों में से एक बात का होना तो तय है ।क्योंकि अगर ये बात नही है तो ये हरगिज़ नही हो सकता है कि हर दूसरे चैनल पर चींख चींख कर उन मुद्दों पर बहसें हो रही हो जिनका कोई मामला ही न हो। जिनकी कोई तुक ही न हो। और अहम मुद्दे गायब हो तो कोई तो वजह होगी ही?

टीवी चैनल्स हो,या समाचार पत्र हो या सोशल मीडिया हो इन जगहों पर आप नज़रें घुमाकर गौर करोगे तो आपको ये नज़र आयग की एक खाई है,जहां आप धकेले जा रहें है। आपके दिमाग मे ये बात पूरी शिद्दत के साथ बैठाई जा रही है कि “प्रेयर” होने को लेकर डाली गई याचिका इस देश का सबसे बड़ा मुद्दा है,और इस बात नही होगी तो देश मे भुखमरी हो जायगी।

इसे तो फिर भी छोड़िये कोई साहब देश मे मदरसों पर एक टिप्पणी करते है और बड़े बड़े “जागरूक” बस उसी बात को घिसते रहते है,अलादीन के चिराग की तरह जिसमे से बस “पब्लिक” का जिन्न आता है और तमाम मुद्दों को किस तरह बहुत आसानी से बहुत मोहब्बत से खा जाता है और हैरत की बात है होती है कि हमे पता ही नही होता है।क्योंकि जब तक “डिबेट खत्म होती है तब तक हम किसी न किसी के पक्ष में होंगे या विरोध में होंगे।

बस इसी तरह ये दास्तान 5 से 6,6से 7 और 7 से 8 और फिर 8 से 9 अलग अलग जगह चलती है कभी लगता है कि क्यों? क्यों अलग अलग जगहों पर छह से सात खिड़कियों में बैठे “जज” फैसलें सुनॉ रहें है,और क्यों दिमाग मे अपनी मर्ज़ी की चीजें भर रहें है। अब ऐसा क्यों है ये होना अलग बात है,लेकिन ऐसा ज़रूर है कि ऐसा होना भयानक है क्योंकि फैसले खुद जज बनाकर जनता सुनायेगी और “लाइव टीवी” पर सुनायेगी तो ये भी ज़ाहिर है होगा ही कि न्यायपालिका की हमे ज़रूरत नही रह जायेगी।

अब जब हम न्यायपालिका की हमे ज़रूरत नही है और “फैसलें” हम कर चुके है तो किसान, पिछड़े,ज़रूरतमंद की बात होगी ही क्यों? उन्हें बस उग्रता,गुस्सा,झिड़कना और चींखना बेचा जाता है,और अफसोस कि बात ये कि इसे खरीदने वाले बहुत है जो इस तमाशे को खेल रहें है और देख रहें है। क्योंकि बहुत लोग जान रहें है और देख रहें है और करें भी क्या? क्योंकि सब कुछ “खेल” चल रहा है…

असद शेख

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here