मदरसों को लेकर किसी वसीम रिज़वी का बयान चर्चाओं मे है, सुनने मे आया है कि अपने सियासी आक़ाओं को ख़ुश करने के लिए उन्होने यह बेसुरा राग अलापा है हालाँकि बेसुरा है पर उनके सियासी आक़ाओं को यही बेसुरा राग पसंद है, यह भी सुना है कि नज़राना बतौर कुछ मिलने की उम्मीद भी वसीम रिज़वी को है, अच्छी बात यह है कि अक्सर शिया हज़रात ने भी और यहाँ तक कि बहुत से हिन्दुओ ने भी उनके इस बयान की मज़म्मत ( निंदा) की है।

रही बात मदरसों की तो सुनो मदरसें कहीं, जंगल, बीहड़ या टापूओं पर नही चल रहे कि वहाँ कुछ भी होता रहेगा और पता नही चलेगा, मदरसें बस्तियों के बीच या बस्तियों से लगी ज़मीन पर ही चलते हैं ,सबको सब कुछ दिखता है, ज़्यादातर बल्कि लगभग सभी मदरसे रजिस्टर्ड हैं तो क्या सरकार ने बिना तहक़ीक़ के रजिस्टर्ड कर दिये हैं ? बहुत से मदरसों को सरकार अनुदान देती है और कुछ मदरसों मे टीचर्स की तनख़्वाह भी सरकार देती है, कुछ मदरसे ऐसे हैं कि वहाँ से फ़ारिग़ मौलवी ग्रेजुएट के समकक्ष माना जाता है जैसे दारूल उलूम देवबंद, मज़ाहिर उलूम सहारनपुर , नदवातुल उलूम लखनऊ, वग़ैरह, यहाँ से पढ़ा हुआ मौलवी सेना तक मे भी जा सकते हैं, तो साबित हुआ कि मदरसे न सिर्फ़ सरकार की निगरानी मे बल्कि सरकार के सहयोग से चल रहे हैं , अब मदरसों को शक की नज़र से देखने वाले ख़ुद सोचें कि क्या सरकार किसी इतनी बड़ी व्यवस्था को सहयोग कर सकती है जो संदेहास्पद हो ? सहयोग की छोड़िये, क्या ग़ाफ़िल भी रह सकती है ? और पिछले चार सालों से तो सरकार भी……………… ख़ैर छोड़ो उस बात को,
कहना यह है कि मदरसों की दुनिया कोई अलग दुनिया नही है, न वो किसी और ग्रह पर चल रहे हैं कि सरकार या बहुसंख्यक समाज की नज़रों से कुछ छिपा या बचा हुआ है, इसके बावजूद भी मुल्क का हर मदरसा हर किसी के लिये हर वक़्त खुला है जो चाहे, जब चाहे जाकर देख सकता है कि वहाँ क्या हो रहा है, क्या पढ़ाया जा रहा है, क्या सिखाया जा रहा है मदरसे इस मुल्क की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं, मदरसों मे पढ़ने वाले लाखों करोड़ो बच्चे इसी मुल्क मे अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं, पढ़ाई पूरी करने के बाद भी वो मुल्क के दूसरे नागरिकों की तरह अपना सामान्य गृहस्थ जीवन जी रहे हैं ,
यह मौजूदा सूरत ए हाल है, तारीख़ की बात करें तो मुल्क की आज़ादी और तरक़्क़ी मे मदरसों का योगदान किसी से छिपा नही है,

लेखक-नदीम अख्तर

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