ऐसी चितेरी फिल्में कम ही बनती हैं जिसको देखकर आप 2D में भी 3D जैसा फील पाएं. कुछ भी बड़ा स्क्रीन जैसा न लगे. सब बिल्कुल असल माल, गाना भी.

फिल्म का कथानक कसा हुआ है, संवाद वातावरण अनुकूल हैं. गाने पांच थे लेकिन हर एक गाना दृश्यों को और प्रभावशाली बनाता है. कभी ये नहीं लगा कि इस गाने की क्या जरूरत थी. मुख्य अभिनय में विनीत कुमार सिंह विश्वसनीय लगे. जोया इस फिल्म का केक पर स्ट्रॉबेरी थीं. जिसने इस सब पर चार चांद लगाया, वो थे जिमी शेरगिल. जिमी प्रतिभाशाली अभिनेता हैं, किरदारों को अपना बना लेते हैं. फिल्म में निभाया गया उनका भगवान जी का किरदार चोट खाई आंख और उनकी मारक संवाद अदायगी से जी उठता है. रविकिशन ने भी इन सबका अच्छा साथ दिया. बाकी की पूरी कास्ट भी बिल्कुल सटीक है. अनुराग कश्यप अपनी पिछली दो ऑफबीट फिल्मों, अगली और रमन राघव के बाद अपने पुराने रंग में लौट आए हैं. ये फिल्म मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विसंगतियों पर भी करारा व्यंग कसती है.

फिल्म में बीफ के नाम फैलाई जा रही हिंसा का भी जिक्र है, भारत माता का जयकारा लगाती उन्मादी भीड़ का भी, सवर्णवाद का कुरूप चेहरा भी और सबसे ऊपर अपने देश में खेलों के प्रति इतने उदासीन और भ्रष्ट रवैये का उघड़ा हुआ चित्रण भी.

इस पूरी फिल्म में बस एक सीन नॉन रियलिस्टिक है, जब हीरोइन की अम्मा गाना गा रही हैं तो संवाद के वक्त भी गायिका की आवाज चलती है, जोकि एक तकनीकी भूल मानी जा सकती है.

बाकी फिल्म अच्छी है, सब सामान्य है, यही अच्छा है. फिल्म के अंत में एक टेक्स्ट प्लेट आती है, जिसकी आखिरी लाइन होती है, ओलंपिक में पदक जीतने वाले दो बॉक्सरों पर फिल्में बन रही हैं. बस यही इस फिल्म का यही उद्देश्य था, यही सार है.

Pragya srivastava

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