कोई मज़ाक नही चल रहा की समर्थन और विरोध की ढपलियाँ बजाई जाएँ।कभी तो सियासत से अलग देश के लिए सोच लिया कीजिये।यह वक़्त सरकार के गुणगान का या खींचतान का नही है बल्कि समस्या और आगे की है।चार जज आकर प्रेस कांफ्रेंस करके चले जाएँगे और हम पक्ष विपक्ष के प्रवक्ता बने,सफ़ाई देते रहेंगे।
यह जो चारों जज ने कल किया है यह बेहद अप्रत्याशित था।देश की साख तो जो दाँव पर है ही उससे कहीं ज़्यादा तो दाँव लोकतन्त्र के सबसे मज़बूत खम्भे पर लगा है।मज़ाक,व्यंग्य,पार्टीबन्दी,गाली गलौज से बाहर आकर इस वक़्त तो गम्भीर हो जाइये।सबसे खतरनाक होता है गम्भीरता की जगह मज़ाकिया हो जो जाना।

न्यायपालिका जिस देश की लड़खड़ाई वह देश पूरा लड़खड़ाकर कर गिर सकता है।इस पर गम्भीर होईये।देखिये की आखिर उन चार दीवारों के बीच चल क्या रहा है।आखिर वह कौन सी घटनाएँ हैं जो उनमे से कुछ को बाहर आना पड़ा।अब या तो कुछ अंदर गड़बड़ है या तो कुछ बाहर या तो दोनों में ही मगर इतना ज़रूर है की सही कहीं भी नही है।
इस मुल्क़ से जो भी दिल से मोहब्बत करता होगा,वह फिक्रमन्द होगा।वह परेशान भी होगा मगर वह एक दूसरे से लड़ नही रहा होगा।मुल्क़ से नकली मोहब्बत करने वाले लोग इस मुश्किल वक़्त में कुर्ते नोच रहे होंगे जबकि यह वक़्त समस्या से निपटने का है।दुनिया का हर शासन अपने न्याय की दुहाई देकर ही जनता पर राज करता रहा है अगर यह न्याय की उम्मीद फीकी पड़ी या इसमें शक की गुंजाईश बढ़ गई तो यह बेहद खतरनाक है।

देश की सभी पार्टियों को इसपर एक साथ बैठना चाहिए।प्रधानमन्त्री को सबको साथ लेकर इसपर बातचीत करनी चाहिए।इसे उनका अंदरुनी मामला कहकर टालना ही तो और खतरनाक है।देश की जनता के लिए सब बराबर हैं, इसलिए उनमे पकने वाली खिचड़ी पर सबकी नज़र होनी ही चाहिए।जो भी दोषी निकले उसपर करवाई हो।ताकि आइंदा से लोकतन्त्र के कोई भी स्तम्भ को फ़र्ज़ी चौथे स्तम्भ तक न आना पड़े।इस वक़्त सब एक होईये और उसको बचाने में लगिए जो आज नही तो कल हमारी साँसों की हिफाज़त करेगी,हमारी न्यायपालिका।
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Hafeez kidwai

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