Pic courtesy- Swamirara.com

अगर 1857 में देश आज़ाद हो जाता तो भारत का स्वरूप क्या रहता ? आज भी यहाँ रियासते होती । जिनमे पागल हुक्मरान अपनी मर्ज़ी से न्याय कर रहे होते । किसी राज्य में पंडितो का कब्ज़ा होता और वो हिन्दू राष्ट्र होता तो किसी राज्य में मुल्लाओं का कब्ज़ा होता और वो इस्लामिक राज्य होता । और ये राज्य आपस में कुत्ता-बिल्लियों की तरह लड़ रहे होते ।

अंग्रेज़ो की हज़ार कमियां है उन्होंने जो कुछ भी किया सिर्फ अपने लाभ के लिए किया पर इसी लाभ ने भारत को लिखित संविधान दिया । भारत में आज जो कश्मीर से कन्याकुरी तक जो थोड़ी बहुत एकता नज़र आती है वो संवैधानीक एकता ही है, भारतीय राज्यो के स्वरूप को कर्तव्यों की जगह अधिकार में बदलने का श्रेय क्या उनको नहीं दिया जाना चाहिए ?

आधुनिक भारत की बात करें तो महात्मा गांधी ने जिस देश की कमान जवाहरलाल को सौंपी थी, वह देश अभी-अभी खून की नदियां पारकर, अाजादी के किनारे लगा था ।( इसमे भी शक नही की इस बटवारे में कंग्रेस की अपनी भी भूमिका रही है ) आज़ादी के बाद नेहरू के हाथ में जो भारत मिला वो धर्म के नाम पे बटा भारत था । जहाँ धर्मांधता का बोलबाला था ।

ऐसे में भारत को सबका भारत बनाने की ज़िम्मेदारी नेहरू पे थी जिसके लिए एक ऐसे संविधान की आवश्यकता थी जो ‘ Idea of India ‘ को प्रस्तुत करे । बाबा साहब अम्बेडर ने ऐसे संविधान बनाने की ज़िम्मेदारी ली जिसमे सभी की पहचान और महत्त्व सामान रहें पर ये भी सनद रहे की अंबेडकर ऐसा संविधान इस लिए भी बना पाए की उनके आग कांग्रेस के मुखिया के रूप में नेहरू खड़े थे ।

बाबा साहब के बनाए गए संविधान को पास कराने की ज़िम्मेदारी नेहरू पे थी । भारतीय संविधान के लिए जितना श्रेय बाबा साहब को जाता उतना ही नेहरू को भी जाता है । कांग्रेस की ये कमी रही कि उसने 60-70 साल देश मे हुकूमत करने के बावजूद संवैधानिक मूल्यों को समाज/व्यक्तियों तक नही पहुंचा पाई । यही कारण है कि आज संविधान बचाव आंदोलन चलाना पड़ रहा है ।

बाबा साहब हमेशा से ये महसूस कर रहे थे कि अगर इस देश मे लोकतंत्र रहा और संविधान का राज हुआ तो धीरे-धीरे ही सही पर इस देश से ब्राह्मणवाद को खत्म किया जा सकता है । इसलिए बाबा साहब शिक्षित होने , संगठित होने और संघर्ष करने की बात करते हैं । उन्हें पता था कि लोकतंत्र में हाथ गिने जाते हैं अगर बहुजनों के अंदर जागरूकता आई तो संसद में इन्ही का राज होगा ।

दलितों के ऊपर तमाम अत्याचार होने के बावजूद बाबा साहब बुलट की जगह बैलट को चुनते हैं, बदले की जगह बदलाव को । आज गणतंत्र दिवस पे हम अगर दलितों की स्थिति की तुलना 1947 से करें तो हमे अंतर साफ नज़र आ जाएगा । ऐसा नही है कि दलितों के हालात बहुत अच्छे हैं पर तुलनात्मक रूप से दलित आवाज़ एक प्रमुख राजनीतिक आवाज़ बन चुकी है । हमे और आपको संवैधानिक मुल्यों का अर्थ समझना होगा और इसे अपने समाज के विकास का आधार बनाना होगा ।

*लेनिन मौदूदी*

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here