तिरंगा भारत की शान-आन-बान सबकुछ है, बिल्कुल वैसे ही जैसे प्रत्येक देश के लिए उसका ध्वज होता है। इसमें कोई संदेह करने या होने की बात ही नहीं हो सकती, जो भी व्यक्ति, पुरुष, स्त्राी इसकी आलोचना करें, सम्मान न करें, वह कुछ भी हो सकता होगा, पर भारतीय हिन्दुस्तानी तो नहीं हो सकता है। लेकिन वर्तमान में तिरंगा और राष्ट्रवाद को लेकर जो तुच्छ राजनीति होने लगी है, वह न तो तिरंगा का सम्मान हो सकता है, न ही राष्ट्रवाद और न ही देशभक्ति हो सकती है। लेकिन इसको राष्ट्रवाद, देशभक्ति और तिरंगे का सम्मान कहा जा रहा है।

जिसके परिणाम बहुत ही घातक होंगे,और होंगे क्या हो रहे हैं, आज भारत राष्ट्रवाद के नाम पर भीड़वाद, धर्मवाद को बढ़ावा दे रहा है। दिन-पर-दिन राष्ट्रवाद के नाम पर भीड़वाद के नाम पर सार्वजनिक रूप से हत्याएं की जा रही हैं। यह कितना उचित है कि हम इन हत्याओं को अलग-अलग कारणों से सही ठहराने भी बैठ जाते हैं। क्या कोई भी कारण हो सकता है कि मानवता का हनन खुलेआम होता रहे और हम प्रत्येक हत्या को जस्टीफाई करते रहे? कि जब उसकी हत्या हुई थी तब, तुम नहीं बोले, जब इसकी हत्या हुई थी तब वो नहीं बोले।

यह प्रवृत्ति दिन-पर-दिन बढ़ रही है। अब तक तो पूरे देश को इस प्रवृत्ति के खिलाफ खड़े हो जाना था, सड़कों पर आ जाना था, पर अफसोस हम भारतीय नहीं हो सके, हम वही रहे जो सालों पहले थे, हिन्दू रहे हम, मुस्लिम रहे हम और सब कुछ रहे पर भारतीय और इंसान नहीं बन सके। यदि बन गए होते तो आज यह सब न हो रहा होता जो हो रहा है।

कासगंज के दंगे का दोषी कौन है?

अब बात करते हैं 26 जनवरी, 2018 के 69वें गणतंत्रा दिवस की भारत में अपने संविधान के लागू होने की यह 69वीं वर्षगांठ थी और पूरा भारत इसे राष्ट्रपर्व की तरह ही माना रहा था, जैसा प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है, परन्तु पिछले कुछ सालों से गणतंत्रा दिवस और स्वतंत्राता दिवस को राष्ट्रीय पर्व की तरह नहीं बल्कि कुछ लोगों द्वारा धार्मिक पर्व के रूप में मनाने का चलन चल गया है, जो कि किसी भी प्रकार से उचित नहीं भारत के संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को उसके धर्म के हिसाब से उसको धार्मिक पर्व मनाने व किसी भी धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन करने की आजादी दी हुई है।

बशर्ते किसी दूसरे धर्म या मजहब के लोगों को किसी प्रकार की ठेस न पहुंचे। लेकिन 26 जनवरी राष्ट्रीय पर्व है किसी एक धर्म का धार्मिक पर्व नहीं। लेकिन भारत में आज कल धर्मवाद को ही राष्ट्रवाद कहा जा रहा है, यह सिर्फ दुखद नहीं, बल्कि बहुत ही घातक है, क्योंकि जब-जब किसी भी देश ने अपने देश में धर्मवाद को ही राष्ट्रवाद बनाया या बनाने की कोशिश की तो उसका परिणाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है क्या हुआ?

दंगें हुए, देश बर्बाद हुए, सरेआम बलात्कार हुए, धार्मिक उन्माद का कब्जा जरूर हुआ, परन्तु उस देश के सभी नागरिक फिर नागरिक न रहे। पाकिस्तान हो, बाग्लादेश हो या इसी तरह के अन्य कई उदाहरण हमारे सामने हैं, लेकिन फिर भी 21वीं सदी में भारत के लोग और सरकारें यह सीख नहीं ले रहीं हैं, जिन भी देशों में धार्मिकवाद हावी हुआ वहां का राष्ट्रवाद मर गया, और राष्ट्रवाद की हत्या किसी और देश या दुश्मन देश ने नहीं की बल्कि उसी देश के धार्मिक उन्मादियों ने की, जो स्वयं को राष्ट्रवादी कहते फिरते थे।

भारत में भी यही दिन पर दिन तेजी से फल-फूल रहा है। इसी का अंजाम उत्तर प्रदेश के कासगंज में देखने को मिला कि गणतंत्रा दिवस के दिन एक नौजवान की हत्या हो गयी और कई घायल हो गये। एक अन्य राहगीर युवक को अपनी एक आंख गवानी पड़ी। पुलिस प्रशासन अपनी कार्यवाही कर रहा है। करेगा, पर क्या वह नौजवान वापस आएगा, जिसकी हत्या राष्ट्रवाद के नाम पर हो गयी, नहीं आ सकता, सारे हिन्दुस्तान को यह सोचना चाहिए, कि हम कहां और किस ओर जा रहे हैं?

भगवा यात्रा का उद्देश्य क्या है?

अब बात करते हैं, तिरंगा यात्रा के नाम पर भगवा यात्रा की, सर्वप्रथम तो यह कि इस यात्रा का क्या उद्देश्य हैं, इसको कौन और क्यों निकाल रहा है, तिरंगा फहराया जाता है, न कि हुडदंग के लिए तिंरगे का इस्तेमाल किया जाता है। चलिए मान भी लिया कि युवाओं का यह एक तौर से तिरंगा का सम्मान करना है, तो करिये इसमें भी कोई बुराई नहीं, पर पिछले कुछ सालों से हाथों में भगवा झंडों के बीच तिरंगा कहीं लुप्त हो गया है, धर्मवाद के सामने राष्ट्रवाद को छोटा कर दिया गया है, लेकिन तिरंगा यात्रा निकाले वाले स्वयं को सबसे बड़े राष्ट्रवादी कहते हैं, क्या यह राष्ट्रवादी बताने का कष्ट करेंगे कि तिरंगा यात्रा में किसी भी धर्म के झंडे का क्या काम है? क्योंकि तिरंगे के स्थान पर हिन्दुत्व के भगवा झंडे को फहराने का जो चलन हैं, वह कहां से और क्यों आया है? शायद इसका सही जवाब वह हिन्दुवादी संगठन दे सकते हैं जो तिरंगा यात्रा का बैनर लेकर भगवा झंडों की यात्रा निकालते हैं।

अप्रत्यक्ष रूप से सरकारें दें रहीं बढ़ावा

राजस्थान के राज समंद के बर्बर एक युवक की लाइव वीडियो बनाकर हत्या करना हो, उसके बाद उस हत्यारे का खुद को हिन्दुत्व का हीरो बनाकर पेश करना हो, उसके समर्थन में सैकड़ों-हजारों लोगों का हुडदंग करना हो, भगवा झंडों के साथ हाईकोर्ट की छत पर चढ़ जाना हो, न्याय के मंदिर कहे जाने वाले हाईकोर्ट पर भगवा लगाना हो, सड़कों पर दंगा करना हो। प्रतिदिन गौ-रक्षा के नाम पर भीड़ द्वारा किसी भी व्यक्ति को पकड़कर मारना या जान से मार देना हो।

कासगंज में एक युवक को खुलेआम गोली मार देना हो, तिरंगा यात्रा के नाम पर भगवा यात्रा निकालना हो, हिन्दुत्ववाद को राष्ट्रवाद कहना हो, स्वयं सरकारों और मुख्यमंत्राी के द्वारा भी यही कहना हो, हिन्दुत्व धर्मवाद नहीं राष्ट्रवाद है, इतना सब होने के बाद भी कई राज्यों में सत्ताधारी सरकारों का उनके खिलाफ कार्यवाही का रवैया इतना लचीला होना, और कई मंत्रियों और नेताओं द्वारा मीडिया के सामने इन उन्मादियों का समर्थन करना यह साफ कर देता है कि यह सिर्फ किसी संगठन के द्वारा नहीं किया जा रहा, अप्रत्यक्ष रूप से सरकारें ऐसी मंशा रखती हैं। यदि नहीं रखती तो पिछले कुछ सालों में इस तरह की घटनाओं में अचानक इतना इजाफा न हो जाता।

अभिषेक शायर
(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार है)

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