जी ले ,,,तू बेफिकर
शहरों के भीड़-भाड़ वाले इलाकों में अक्सर,,,आप अटपटाई होंगी यूँ ही चलते चलते,यकीनन साथ चलती महिलाओं और भीड़ से भी नज़रें चुराने को बाध्य भी हुई होंगी।वजह,शोकेस में पुतलों पर सजे महिलाओं के अंतर्वस्त्र ,झीने लेस से बने,चटक रंगों में,,,और तो और इतने पारदर्शी जिन्हें पहनने या न पहनने से कोई फ़र्क़ नही पड़ना।मुझे आज तक सिर्फ महिलाओं के ही अंतरवस्त्रो की यह प्रदर्शनी कभी समझ नही आई।और इनकी दुकाने हमेशा से शहर के सबसे पिछड़े और घने बाज़ारो में ही मौजूद मिली।उन पर लार टपकाते आदमी भी दिखे,जिनकी निगाहों में वासना ,अगल-बगल से गुजरती महिलाओं का फुल एक्स रे करते दिखना आम है।
कभी सुबह इन दुकानों के पास से गुजरिए तो आपको इन दुकानों के कर्मचारी मैनिक्विन के कपड़े बदले के बहाने,,उभारो को सहलाते दिख सकते हैं।सालों से यह पोर्नोग्राफी झेलने को हम महिलाएं बाध्य हैं ,ये चलन शुरू कब हुआ मुझे पता नही,मगर बचपन से यह फूहड़ता देख रही हूं।
मुझे यह बताइये क्या इस प्रदर्शनी के बगैर आप अंतर्वस्त्र बेचने की कल्पना नही कर पाते??? महिलाओं की ब्रा,जो हकीकत में स्तनों को सपोर्ट देने के लिए होती है,,उसमे ऐसी क्या सेक्स अपील है?, कि उसे बाजार ने सेक्स ऑब्जेक्ट बना दिया है?? यौन उत्तेजना भड़काने का एक महत्वपूर्ण टूल,जैसे कथित-जापानी तेल।
हकीकत में स्तनों के सॉफ्ट टिश्यू डैमेज न हो इसलिए उन्हें एक ऐसे सहारे की जरूरत होती है जो उन्हें मजबूती दे,,मगर बाजार ब्रा को सेक्स ऑब्जेक्ट बताता है।बाजार के लिए,,,ब्रेस्ट का साइज भी एक कॉमोडिटी हो चला है,छोटे स्तनों को बड़ा करिये और पति/बॉय फ्रेंड को लुभाईये।पता नही इस लुभाने की सोच से आगे स्त्रियाँ कब बढ़ेंगी?
हम भारतीय अपने शरीर की सामान्य गतिविधियों के प्रति सहज नही हैं,,,,हमने मासिक,ब्रा,सेक्स इन सभी को वर्ज़ित विषय करार दे रखा है।जबकि हर व्यक्ति के जीवन मे किशोरावस्था से यह बदलाव शुरू हो जाते हैं।जितना पुरुषों को शेव की जरूरत है उतना ही महिलाओं को ब्रा की।उचित अंतर्वस्त्र से व्यक्ति के कॉन्फिडेंस में बढोत्तरी भी देखी गयी है। लेकिन सिर्फ महिलाओं के वस्त्रों को सेक्स ऑब्जेक्ट बनाना कितना उचित है??
आप कल्पना भी नही कर सकते,एक बच्ची जब किशोरावस्था में प्रवेश करती है तो अपने शरीर मे हो रहे बदलावों से वो कितनी उलझन में होती है,ऐसे में कोई भी मदद जो उसकी हिम्मत को बनाये रखे उसके खुद के लिए बहुत जरूरी है।हम एक बहुत ही संकीर्ण समाज मे रह रहे हैं जहाँ लोग अपने शरीर को लेकर सहज नही,मोटापा,ब्रेस्ट साइज,लिंग साइज जैसी तमाम फालतू की मनोवैज्ञानिक दबाव देने वाली,,,,बातों में घिरे किशोरों और महिलाओं को कई बार इनसे जूझना बड़ा भारी पड़ता है।कपड़ों में से झांकती ब्रा की स्ट्रैप,,,,सबके सामने आपको शर्मिंदा कर देती है,,,क्यों?
क्या शर्ट में से झांकती बनियाइन आपको असहज करती है कभी?शायद कभी नही।फिर ब्रा क्यों?क्योंकि ब्रा-को सेक्स ऑब्जेक्ट बना दिया गया है,और सेक्स भारतीय समाज मे बहुत बुरी चीज है।सो सेक्स से जुड़ी हर वस्तु बुरी होगी।
वैसे हम भारतीय शादियों के बड़े दीवाने है,,,लेकिन सेक्स और सेक्सुअलिटी के लिए उतने ही शर्मिंदा अपने आप से भी,,,,बिना सेक्स की शादी,कल्पना करिए तो इसकी ज़रा, और सेक्स की बात आते ही पानी -पानी हो जाइए।
खैर,आज की जनरेशन जो खुल कर सेनेटरी नैपकिन पर बात कर रही,यकीनन इस तरह से अंतर्वस्त्रों के ऑब्जेक्टिफिकेशन को लेकर शायद सहज हो रही,और अगर नही हो रही यो उसे होना पड़ेगा।दिन प्रतिदिन बढ़ते यौन दुर्व्यवहारों में इस तरह की कुंठाओं का भी अपना योगदान है।पत्रिकाएं भी कोमलांगी कन्याओं की तस्वीरें अंतर्वस्त्रों में छाप खुद को बड़ा सामाजिक योगदान देने वाला समझती है,,,,लेकिन कभी ये सोचा-अंतर्वस्त्र तो हर व्यक्ति की जरूरत हैं,वो उन्हें खरीदेगा ही,पत्रिकाओं में छप कर क्या विशेष प्रमोशन होना ऐसे उत्पादों का?
बजाय इसके,इस तरह की सामग्री,सुंदरता और सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर उपलब्ध करवाने से,कुंठित और मनोरोगी किस्म के लोगों से महिलाओं को खतरे जरूर बढ़ जाते हैं।बेहतर होगा हम कपड़ो को कपड़ा रहने दें,,,सेक्स टॉय न बनाएं।

शिल्पी चौधरी

लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं…

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