हाँ, मैं प्रचार करता हूँ!

सोशल मीडिया में ख़ासतौर पर फेसबुक ने हिन्दी साहित्य के कई मठों, किलों और खेमों को ध्वस्त करने का महत्वपूर्ण काम किया है| इसने हिन्दी साहित्य में एक लंबे अरसे से चले आ रहे पुरोहितवाद पर बुलडोजर चला दिया है|अब किसी तथाकथित मुख्यधारा के पंडा छाप आलोचक, कवि ,कहानीकार या दादा टाइप संपादक का वर्चस्व नहीं रह गया है |अब ऐसे लोगों के पूर्वाग्रह से ग्रसित बयानों और व्याख्यानों और आलेखों का कोई महत्व नहीं रह गया है| कुछ पत्रिकाओं में लिखने -छपने वाले, उसकी सियासत पर ज़िंदा लोग अब अवसाद के शिकार हो रहे हैं |ऐसे भी पत्र -पत्रिकाओं में छपीं ज़्यादातर रचनाएँ, ख़ासतौर पर कविताएँ पहले फेसबुक या किसी ब्लॉग पर पढ़ने को मिल जाती हैं |बहुत सारी बेहतरीन कविताएँ मैं इसपर पढ़ता रहा हूँ, पिछले कई साल से |मुझे नहीं लगता कि फेसबुक पर कविता लिखना -पढ़ना किसी अपराध की श्रेणी में आता है |इधर फेसबुक पर कुछ लोग लगातार विलाप कर रहे हैं|वे रोना धोना मचाए हुए हैं कि हाय अब कविता और साहित्य का क्या होगा? वे बहुत ही कठिन परीक्षा से गुजरकर पत्रिकाअों में स्थान पाती थीं|अब जिस नासपीटे को देखो तो फेसबुक पर कविता उगल रहा है |हाय अब क्या होगा कविता और साहित्य का? कुछ लोग लगातार मर्सिया गा रहे हैं |वे सहन नहीं कर पा रहे कि कोई कविता लिख रहा है? फेसबुक पर अपनी कविता या किसी विधा की क़िताब का प्रचार करना बुरा क्यों है? हम अपनी क़िताब को आम पाठकों तक ले जाने के लिए क्यों न प्रचार के तरह -तरह के तरीके या नुस्ख़े अपनाएँ? बहुत सारे साहित्यिक मठाधीशों को लगता है कि उनका धंधा अब कमज़ोर पड़ रहा है |यही हाल तथाकथित बड़े प्रकाशकों है|जिस तरह सोशल मीडिया के ज़रिए क़िताबों को लोग सीधे पेटीएम कर मँगा रहे हैं या अमेज़न जैसी कंपनियों को ऑर्डर देकर मँगा रहे हैं, वह पुस्तक मेला के ठेकेदारों को भी विस्मित करने वाला है! मेरा मानना है कि अगर रश्मि प्रकाशन की तरह कुछ और लेखक प्रकाशन में भी ईमानदारी और लगन से काम करते रहे तो स्तरीय साहित्य को भी जन -जन तक पहुँचा कर उसे बेस्टसेलर बनाया जा सकता है |इस तरह की कोशिश को मैं वैकल्पिक प्रकाशन मानता हूँ|कई लेखक सिर्फ़ अपनी पुस्तकों का प्रकाशन करते हैं |उनको भी कुछ उदार बनने की ज़रूरत है |उन्हें भी नयी पीढ़ी को स्वयं से जोड़ने की ज़रूरत है |मैं अच्छे साहित्य को जन -जन तक ले जाने का पक्षधर रहा हूँ, शुरु से |इस अभियान में प्रकाशक के साथ -साथ लेखक को भी शामिल होने की ज़रूरत है |आज जब बाज़ार के हर प्रोडेक्ट का विज्ञापन चल रहा है, हर संचार माध्यमों पर तब हम ही पीछे क्यों रहें! जन कवि बाबा नागार्जुन जब अपनी कविता गा -गाकर चनाज़ोर गरम वाले की तरह बेच सकते थे तो हम क्यों नहीं? ज़रूरत है साहित्य की छुईमुई कुलिनतावादी मानसिकता से बाहर आने की |सोशल मीडिया न सिर्फ़ साहित्य, बल्कि ख़बरों के लिए भी अन्य जन संचार माध्यमों के लिए एक चुनौती बनकर उभर रहा है |अपनी कविता या कविता की क़िताब को प्रचारित करने में लज्जा का अनुभव क्यों? स्तरीय कविता के नाम पर हम मंच से दूर हुए, अब वही ग़लती यहाँ दुहराना सही नहीं होगा |आप अपनी कविता या अपने साहित्य को रचकर चुप न बैठिए |अगर आपमें दम होगा, आपकी रचना जन सरोकारों से जुड़ी होगी, सशक्त होगी तो लोग स्वीकार करेंगे |आप यक़ीन मानिए कि अब किसी आलोचक या कवि या कहानीकार या संपादक की दादागिरी नहीं चलने वाली है|आप कमज़ोर चीज़ को प्रमोट करेंगे तो ज़रूर एक्सपोज होंगे |आपकी कुटिलता या धूर्तता पकड़ में आ जायेगी |सोशल मीडिया में फेसबुक आदि पर भी बकवास रचना को लोग जान जाते हैं |अच्छी रचना के क़द्रदान यहाँ भी हैं|मैं अपनी कविता की क़िताब के प्रचार ही नहीं, विशाल प्रचार में लगा रहता हूँ |अगर कुछ भी दम होगा तो वो स्वीकार की जायेगी, वर्ना नहीं|मैं अपने इस अभियान या मुहिम को लेकर कतई शर्मिंदा नहीं हूँ|

लेखक- चंदेश्वर

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