मैं पटना विश्विद्यालय के चुनाव को नजदीक से देख रहा हूँ। एक उत्सवी माहौल में छात्र छात्रा स्वयं को सराबोर होते हुए दिख रहे है। लड़कियों की भागीदारी अविश्वसनीय रूप से चकित करने वाले है। ऐसा अंदेशा है कि इस बार छात्र अध्यक्ष के रूप में शायद एक लड़की ही कैम्पस को लीड करते हुए दिखे।

लेकिन मैं यहां जिस चेहरे की बात कर रहा हूँ वो कोई और है। मैं शादाब आलम की बात कर रहा हूँ। मैं जब यह लिख रहा हूँ तब चुनाव के मात्र कुछ ही घण्टे बचे है। हर किसी ने अपनी तैयारी कर ली है। जिन लोगो को वोट देने है वह तय हो गया है। लेकिन फिर भी मुझे लग रहा है कि हमे शादाब आलम के लिए लिखना चाहिए। शादाब आलम जब चुनाव लड़ने की बात किया करते थे तो हमे लगा कि शादाब आलम को छात्र नेता के रूप में नेतृत्व करना चाहिए। एक लीडर के रूप में व्यक्तिगत रूप से जो मैं किसी के अंदर तलास करने का प्रयास करता आया हूँ उसकी एक झलक हमे शादाब आलम के रूप में मिलता हुआ प्रतीत होता है। विश्वविद्यालय में अनेक समस्याएं है, उसको चिन्हित करने बैठे और बाकी के कॉलेजों से तुलना करें तो बिहार का सर्वश्रेष्ठ पटना यूनिवर्सिटी कही भी ठहरता हुआ नही दिखता है। मैं यहां की मूलभूत समस्या को रेखांकित नही करना चाहता लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि शैक्षणिक मापदंड के लिए जो न्यूनतम शर्त होती है उसको यह कैम्पस पूरा नही करता है। छात्रों के विरोध प्रदर्शन सिर्फ राजनीतिक दर्शन तक सीमित रहता है। लाइट-कैमरा और सीधी कॉलर का टशन बहुत तेज है। दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे नामी संस्थानों के छात्रों से हमारा लगातार सशरीर संपर्क रहा है, लेकिन राजनीति का क्षद्द्म वार जितना पटना यूनिवर्सिटी के अंदर महसूस करता हूँ, उतना कही और नही देखा। कौन किसका समर्थन करता है और कौन किसका विरोध करता है इसका अंदाजा मेरे जैसे सरल बुद्धि वाले को लगाना टेढ़ी खीर है। इस बात के अपने राजनीति और सामाजिक मायने होंगे। और इसका विश्लेषण जरूरी है। लेकिन मैं इसका जिक्र सिर्फ इसलिए कर रहा हूँ कि मिस्टर शादाब आलम को मैंने बाकियो से थोड़ा अभी तक अलग देखा हूँ। राजनीति प्रतिस्पर्धा से ऊपर इनका व्यक्तिगत आचरण श्रेष्ठ रहा है। एक विरोधी विचारधारा के लोगो के साथ भी जितनी सहजता से यह व्यक्ति पेश आ जाता है, यह कोई सामान्य गुण नही है। और यह इन्हें विशेष करती है। कैम्पस के अंदर मैंने इस बात की पुष्टि बाकी कई लोगो से व्यक्तिगत चर्चा के दौरान भी सुनते हुए देखा हूँ।

फिर भी यह सवाल जारी रहना चाहिए कि इस आधार पर आप अपना नेतृत्व किसी को क्यो सौप सकते है? और यह रंजन कौन होता है जो प्रमाणपत्र जारी करे कि कौन सही या कौन गलत? लेकिन इसके बाद भी यह सत्य है कि हमे अपनी बात कहने का अधिकार है और मैं उसका प्रयोग कर रहा हूँ। पिछले दिनों जब बीएड के परीक्षा शुल्क 1200 से बढ़ाकर 98000 रुपए कर दिए गए थे उस समय यही शादाब आलम सबसे पहले कैम्पस में आगे आकर सरकार के इस कुख्यात नीति का विरोध किया। और सरकार को फीस वापसी करनी पड़ी। पिछले दिनों भूख हड़ताल के दौरान कॉलेज के बेहतरी के लिए इन्होंने 10 सूत्रीय मांग को सरकार और कॉलेज प्रशासन से मांग की थी, जिसमे से अभी तक 4 मांगो को मान लिया गया है। मैं समझता हूं कि यह बड़ी बात है। और यह तब हुए है जब यहां छात्र संघ चुनाव जैसी कोई बात नही थी। आज तो हर कोई बड़ी बड़ी बात करता हुआ दिख रहा है लेकिन नेतृत्व तो उसी को मिले या करना चाहिए जो उस समय भी आपके वाजिब न्यायिक अधिकारों के लिए साथ रहे जब भीड़ नही था। उस समय भी वह साथ रहे जब कोई लाइट कैमरा – एक्शन युक्त माहौल न हो।

आज मैं यहां देख रहा हूँ कि यहां जातीय गोलबंदी से लेकर धार्मिक परिवेशिकी को भी चिन्हित करके अपने अपने गोल बनाये जा रहे है। लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर नही चाहता कि एक छोटे से कैम्पस के चुनाव के लिए हम उन्ही हथकंडो का उपयोग करे जो इस देश की माटी में रच बस चुका है। फिर क्या भिन्नता होगी एक घाघ राजनेता और एक सरल छात्र नेता ने… अगर यह भिन्नता नही आती है तो फिर यह एक विकराल दुख को लिए हुए एक सड़ांध भरे समाज की दीर्घकालिक स्वप्न्न से समाज की संकल्पना को हम साकार करते हुए दिख रहे है। वर्गों में बँटे हुए समाज में केवल वर्ग संघर्ष ही इतिहास-विकास की कुंजीभूत कड़ी हो सकता है। इससे हमें इनकार नही करना चाहिए। और आपके पास इनकार करने का एक भी कारण नही होगा। लेकिन इस बीच मे जब नेतृत्व की बात आएगी तो उसी चेतनाशीलता से एक विशेष व्यक्ति का चुनाव भी हमे एक श्रेष्ठ समाज के निर्माण में सहयोग दे सकती है।

जब हम पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव की बात कर रहे है तो लाजिम है कि छात्र आंदोलन 1974 के जेपी आंदोलन को याद करना जरूरी हो जाता है। पिछले दिनों जब मैं एक वेब चैनेल से लाइव आया था तो उस आंदोलन की अंतिम परिणिति के रूप में बात किया था। 1974 के भारतीय छात्र-युवा आन्दोलन का लिया जा सकता है। इसमें अग्रणी भूमिका गाँवों-शहरों के उन रैडिकल मध्यवर्गीय छात्रों की थी, जिनका आज़ाद भारत के नये सत्ताधारियों की नीतियों से मोहभंग हो चुका था। बढ़ती बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, नेताशाही और नौकरशाही के विरुद्ध छात्रों का स्वतःस्फूर्त विस्फोटक आक्रोश गुजरात, बिहार और फिर देश के अधिकांश हिस्से में सड़कों पर सैलाब के रूप में बह निकला। इस व्यवस्था-विरोधी छात्र आन्दोलन की न तो कोई स्पष्ट विचारधारा थी, न सुलझा हुआ नेतृत्व था, न ही कोई स्पष्ट कार्यक्रम था। और इसका नतीजा क्या हुआ? हम जो इस आंदोलन से निकले नेतृत्व को देख रहे है वे कितने बड़े बदलाव को आज करते हुए दिख रहे है। पिछले 28 साल से जेपी के शिष्यों के शासन इस बिहार की भूमि पर रही है। और इसी राज्य के जेपी यूनिवर्सिटी में स्नातक स्तर के सत्र 5 साल की देरी से चल रहा है। कांग्रेस एनएसयूआई के बिहार प्रभारी श्री नितेश कृष्णवंशी जेपी यूनिवर्सिटी का छात्र है और कई साल से वह अभी तक प्रथम साल में ही है। वह 10 दिन पहले राज्यपाल से मिलकर मामले को अवगत कराया, तकलीफो को लंबी लिस्ट है। आपको जानकर बेहद तकलीफ होगी कि उस कॉलेज में पढ़ रही छात्राओं को शादी विवाह सम्बन्धी दिक्कते भी सुनने को मिल रहे है। तो यह होती है बिना किसी कार्यक्रम से हुए आंदोलन और उस आंदोलन से निकले नेतृत्व के सत्ता स्थापना से। तो हमे मुखर होकर इस दिशा में बात करने चाहिए। अगर आपने आज नही किया तो फिर कोई हमारी तरह 30 साल बाद आज की तकलीफो को लिखेगा। तो यह नही होना चाहिए। उसे यह मौका मत दीजिए। जब कोई तीस साल बाद लिखे तो वह यहां के गौरव लिखे। वह तकलीफ क्यो लिखे?

मैं अंत में अपनी बात आह्वान संगठन के उस आह्वान से करना चाहता हूं “एक सच्ची क्रान्तिकारी छात्र राजनीति का मतलब केवल फ़ीस-बढ़ोत्तरी के विरुद्ध लड़ना, कक्षाओं में सीटें घटाने के विरुद्ध लड़ना, मेस में ख़राब ख़ाने को लेकर लड़ना, छात्रवासों की संख्या बढ़ाने के लिए लड़ना, कैम्पस में जनवादी अधिकारों के लिए लड़ना या यहाँ तक कि रोज़गार के लिए लड़ना मात्र नहीं हो सकता। क्रान्तिकारी छात्र राजनीति वही हो सकती है जो कैम्पसों की बाड़ेबन्दी को तोड़कर छात्रों को व्यापक मेहनतकश जनता के जीवन और संघर्षों से जुड़ने के लिए तैयार करे और उन्हें इसका ठोस कार्यक्रम दे। ऐसा किये बिना मध्यवर्गीय छात्र अपनी वर्गीय दृष्टि-सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकते। क्रान्तिकारी परिवर्तन की भावना वाले छात्रों को राजनीतिक शिक्षा और प्रचार के द्वारा यह बताना होगा कि मज़दूर वर्ग और व्यापक मेहनतकश जनता के संघर्षों में प्रत्यक्ष भागीदारी किये बिना और उसके संघर्षों के साथ अपने संघर्षों को जोड़े बिना वे उस पूँजीवादी व्यवस्था को क़त्तई नष्ट नहीं कर सकते जो सभी समस्याओं की जड़ है। व्यापक मेहनतकश जनता के जीवन और संघर्षों में भागीदारी करके ही मध्यवर्गीय छात्र अराजकतावाद, व्यक्तिवाद और मज़दूर वर्ग के प्रति तिरस्कार–भाव की प्रवृत्ति से मुक्त हो सकते हैं और सच्चे अर्थों में क्रान्तिकारी बन सकते है।

और दुनिया मे बदलाव होते रहते है। बदलाव को कोई रोक नही सकता, लेकिन बदलाव के असल मजे और मायने तो तब है जब यह बदलाव हमारे सामने हो…

लेखक – रंजन यादव ( राजनीतिक व समाजिक विश्लेषक )

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