जिस लोकतंत्र को बचाने की मीडिया दुहाई देती है और जिसे खुदको लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है (कहीं लिखित तौर पर नही लेकिन कहा जाता है) क्या वाकई वही मीडिया खुद को लोकतंत्र के खांचे में फिट कर पा रही है? क्या मीडिया के भीतर का लोकतंत्र बचा है? क्या मीडिया में कभी लोकतंत्र था? क्या मीडिया की आज़ादी खत्म होने का कारण स्पॉन्सर मिल जाना है या एथिक्स का बीच मे आ जाना है??

इस तरह के कई सवाल मेरे मन मे रोज़ आते हैं हर उस रोज से आते है जब मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू करी, जैसे जैसे में करीब आकर मीडिया को समझता चला गया वैसे वैसे मुझे मीडिया के भीतर का लोकतंत्र भी बहुत कमजोर और बीमार नज़र आया, जैसे कि किसी ने आपके गले मे पट्टा डाल दिया हो न ही आप बोल सकते हो, न ही खुद की मर्ज़ी से लिख सकते हो और न ही अपनी मर्ज़ी से किसी स्टोरी को कवर कर सकते हो और मामला यहीं नही रुका बल्कि आप किसी स्टोरी को निष्पक्षता से दिखा भी नही सकते हो…

मेरे बहुत से दोस्त मीडिया में काम करते हैं और मुलाक़ात पर बोलते हैं कि हम सोशल मीडिया पर लिखना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन जहां हम काम करते हैं वहां से इजाज़त नही मिली हुई, कई लोग सामाज के लिए पत्रकारिता करना चाहते हैं लेकिन उन्हें बहुत ही छिछले तौर से किसी बकवास स्टोरी पर लगा दिया जाता है और सबसे ज़रूरी बात यह भी है कि कइयों को तो मीडिया में काम करके पूरा पैसा भी नही मिल पाता, अपनी ही सैलरी और पीएफ फण्ड के लिए परेशान रहते हैं…

आप खुद सोचिये की जिस मीडिया का खुद का लोकतंत्र इतने बदतर हालात में जी रहा है जो कि समझिये वेंटिलेटर पर है किसी भी वक़्त दम तोड़ सकता है उस मीडिया से हम बदलाव और क्रांति की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो मीडिया अपने ही कर्मचारियों का शोषण कर रहा है क्या वह दूसरों के शोषण के विरुद्ध उतने ही जोश से आवाज़ उठा पाएगा जितना कि हम उम्मीद लगाते हैं? हमें बुनियादी स्तर पर सोचने की ज़रूरत है कि “मीडिया हमसे है हम मीडिया से नही हैं” और इस बात को समझने के लिए मीडिया को करीब से समझिए तो मालूम होगा कि कैसे दलदल है मीडिया, जिसमे दो चार बढ़े मगरमच्छ है और छोटी मछलियों को रोज़ खा रहे है

इमरान

1 COMMENT

  1. बहुत ही कड़वी सच्चाई बयान की है इमरान साहब ने। मीडिया को खुद ग़ौर करने की ज़रूरत है।

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