जब कोई घटना घटित होती है तो रिपोर्टिंग करते वक़्त बहुत सावधानी का ध्यान रखना पड़ता है की एक एक पहलू पर ध्यान रखा जाएं,और इसी में से एक पहलू साम्प्रदायिक घटनाओं के वक़्त रिपोर्टिंग करना,लेकिन क्या तमाम जगहों पर इसका ध्यान रखा जाता है? ये देखा जाता है कि वहां सब कुछ सही है या नही?

पत्रकारिता सीखते हुए एक पॉइन्ट सीखा है पिछले तीन सालों में की कोई मामला अगर साम्प्रदायिक हो या इस मामले दो अलग अलग सम्प्रदाय के लोगों से जुड़ी घटना हो तो उस मामले में आरोपी और पीड़ित दोनो ही के नामों को छुपाया जाएं और किसी के भी नाम को दिखाया न जाएं,क्योंकि यदि नाम सामने आता है तो तनाव में बढ़ोतरी होने की संभावना होगी और घटनाएं और भी बढ़ सकती है,लेकिन इस नियम को मानने से पत्रकारिता “उत्तम” हो जायेगी कोई इसे करें क्यों?

दिल्ली के त्रिलोकपुरी में कल कोई घटना हुई वो मामला क्या है जांच होनी बाकी है,लेकिन इसके दो अलग अलग सम्प्रदायों के बीच बात में मामला बढ़ गया और हालात ये आ गए कि दोनों सम्प्रदायों में पथराव तक हो गया,लेकिन आज के एक बड़े अखबार में आरोपी और पीड़ित दोनो के नामों को बहुत अच्छे से दिखाया हुआ है,जहां दोनो के सम्प्रदायों का पता चल रहा है।

ये कोनसा तरीका है रिपोर्टिंग का जिसमे दोनों सम्प्रदायों के बीच खाई को बढ़ा दिया जाये न कि उस मामले को ठंडा किया जाए,और यदि पुलिस द्वारा वहां कराई बहाल शांति में इस खबर के पढ़े जाने के बाद कोई बवाल हुआ तो इसकी जिम्मेदारी क्या अखबार की होगी?

इतना सब कुछ ये तब हो रहा है कि सिर्फ शुरू से लेकर आखिर तक इसी तरह की घटनाओं को लेकर ही मुज़फ्फरनगर में एक बड़ा दंगा भड़का था,उस वक़्त भी क्षेत्रीय समाचार पत्रों ने आरोपी और पीड़ितों के नामों को छुपाने की जगह उजागर किया था और इस मुद्दे पर अनिल चमड़िया “मीडिया की साम्प्रदायिकता” में मीडिया की इस स्थिति को बता भी चुके है।

इस तरफ अगर ध्यान दे तो अगर इस खबर के बाद किसी की मौत हुई सम्पत्ति का नुकसान हुआ लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ा तो? क्या इन सब की ज़िम्मेदारी समाचार पत्र की होगी? और यदि नहीं होगी तो इतने अहम मामलों में इस तरह नामों की नुमाइश क्यों? इस तरह आरोपी का नाम या पीड़ित का नाम देना आग में घी डालने जैसा है इस बारे में गौर फिक्र करना चाहिए मगर करेगा कोंन?कोन बिल्ली के गले मे घण्टी बांधे? कोन?

असद शेख

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