सत्रहंवी शताब्दी में पांचवें मुग़ल शासक शाहजहाँ ने दिल्ली में लाल किले की स्थापना की थी. उस वक़्त देश की राजधानी को आगरा से दिल्ली हस्तांतरित करने के लिए शाहजहाँ ने इस मज़बूत किले की तामीर की थी. आज़ादी के बाद से आज तक देश के सभी प्रधानमंत्री इसी लाल किले की छत से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश को संबोधित करते रहे हैं. हालांकि पिछले कुछ दिनों से ये इमारत अपने स्वर्णिम इतिहास नहीं बल्कि अपने भविष्य की वजह से चर्चा में है.
तीन दिन पहले खबर आयी कि मोदी सरकार ने लाल किला को डालमिया ग्रुप को गोद दे दिया है. बताया गया कि लाल किले को पांच साल की लीज़ पर लेने के लिए डालमिया ग्रुप ने सरकार को 25 करोड़ की कीमत अदा की है. मीडिया और सोशल मीडिया हर जगह इस सौदे पर सवाल उठने लगे. कांग्रेस, आरजेडी, आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी समेत तमाम विपक्षी दलों और नेताओं ने मोदी सरकार की मंशा पर सवाल उठाये और इस क़दम को गलत करार दिया. राजनेताओं और आम आदमी ने चिंता व्यक्त की इस तरह से सरकार देश की धरोहरों के साथ खिलवाड़ कर रही है और निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश में है.
संस्कृति मंत्री ने समझाया मामला
दरअसल पर्यटन मंत्रालय, आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया और डालमिया भारत समूह के बीच एक एमओयू पर हस्ताक्षर किये गये. जिसके तहत कंपनी को पांच साल के लिए लाल किला और इसके आस पास के पर्यटक क्षेत्र के रख-रखाव और विकास की ज़िम्मेदारी दी गयी है.
अब सरकार की तरफ से इस मामले पर आधिकारिक बयान भी आ गया है. देश के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने ये साफ़ किया है कि लाल किले के लिए डालमिया ग्रुप के साथ 25 करोड़ का अनुबंध नही हुआ है. महेश शर्मा ने कहा लाल किले की खरिद-फरोख्त कसी भी तरह से पैसे के लेन-देन से इनकार कर दिया है. महेश शर्मा ने बताया,”मुझे नहीं पता ये आंकड़ा कहां से आया क्योंकि पूरे समझौते में पैसों की कोई बात है ही नहीं. 25 करोड़ तो दूर की बात है, 25 रुपये क्या इसमें 5 रुपये तक की भी बात नहीं है. ना कंपनी सरकार को पैसे देगी ना ही सरकार कंपनी को कुछ दे रही है.”
शर्मा ने कहा, “इमारत के किसी हिस्से को कंपनी छू नहीं सकती है और इसके रखरखाव का काम पूरी तरह पहले की तरह पुरातत्व विभाग ही करेगा. जैसा पहले पुरातत्व विभाग टिकट देता था व्यवस्था वैसी ही रहेगी और बस पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ जाएंगी. भविष्य में अगर इससे सीधे या परोक्ष तौर पर कोई फायदा होता भी है तो उस पैसे को एक अलग अकाउंट में रखा जाएगा और फिर इस पैसे को इमारत के रखरखाव पर ही खर्च किया जाएगा.”
महेश शर्मा ने कहा, “जनता की भागीदारी बढ़े इसके लिए 2017 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने पुरातत्व विभाग के साथ मिल कर एक योजना शुरू की जिसका नाम था ‘अडॉप्ट अ हेरिटेज-अपनी धरोहर अपनी पहचान’ यानी अपनी किसी धरोहर को गोद लें. इसके तहत कंपनियों को इन धरोहरों की सफाई, सार्वजनिक सुविधाएं देने, वाई-फाई की व्यवस्था करने और इससे गंदा होने से बचाने की ज़िम्मेदारी लेने के लिए कहा गया था.”
ये है गोद लेने का ढांचा
उल्लेखनीय है कि सरकार ने पिछली साल 27 सितम्बर 2017 को पर्यटन दिवस के अवसर पर ‘अडॉप्ट अ हेरिटेज-अपनी धरोहर अपनी पहचान’ योजना का उद्घाटन किया था. यह योजना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के प्रमुख स्मारकों में शुरू की गई है, जिसके तहत 95 स्मारकों को शामिल किया जा चुका है. इस योजना के तहत विभिन्न धरोहरों को गोद लेने के लिए 195 आवेदन मिल चुके हैं. जिन्हें रखरखाव के लिए सरकार प्राइवेट कंपनियों को सौंप सकती है. सरकार का कहना है कि इस स्कीम के ज़रिये ऐतिहासिक इमारतों को पर्यटकों के बीच और लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जाएगी.

सरकार का कहना है कि डालमिया ग्रुप के पास लाल किले के सौंदर्यीकरण, रखरखाव की ज़िम्मेदारी होगी. 9 अप्रैल को किये गए समझौते के तहत डालमिया ग्रुप को छह महीने के भीतर लाल किले में ज़रूरी सुविधाएं मुहैया करानी होगी. इसमें एप बेस्ड गाइड, डिजिटल स्क्रिनिंग, फ्री वाईफाई, डिजिटल इंटरैक्टिव कियोस्क, पानी की सुविधा, टेक्टाइल मैप, टॉयलेट अपग्रेडेशन, रास्तों पर लाइटिंग, बैटरी से चलने वाले व्हीकल, चार्जिंग स्टेशन, सर्विलांस सिस्टम, कैफेटेरिया आदि शामिल है.
कंपनी का आधिकारिक बयान
वहीं डालमिया ग्रुप ने एक बयान जारी कर कहा है कि कंपनी ने आगामी पांच सालों के लिए दिल्ली के लाल किला और आंध्र प्रदेश के कडप्पा स्थित गंडीकोटा किले को गोद लिया है. इन इमारतों का रखरखाव कंपनी सीएसआर इनिशिएटिव यानी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के ज़रिए किया जाएगा और कंपनी पर्यटकों के लिए शौचालय, पीने का पानी, रोशनी की व्यवस्था करने और क्लॉकरूम आदि बनवाने के लिए अनुमानित 5 करोड़ प्रतिवर्ष खर्च करेगी.
डालमिया ग्रुप की प्रवक्ता पूजा मलहोत्रा ने बीबीसी से बात करते हुए बताया कि, “कंपनी ने पांच साल के लिए इस धरोहर को गोद लिया है. इसके तहत कंपनी पर्यटकों के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का विकास करेगी और इसका फ़ायदा पर्यटकों को ही पहुंचेगा.”
पूजा का कहना है कि पैसे के लेन देन की बात सरासर गलत है. उन्होंने बताया, “ये बात ग़लत है कि इस योजना के लिए सरकार कंपनी को या कंपनी सरकार को कुछ पैसे देने वाली है.” डालमिया ग्रुप का कहना है कि वो सारी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सालाना 5 करोड़ रूपये तक का खर्चा करेगी.
क्या है सीएसआर
सीएसआर मामलों के जानकार अभिनव सिन्हा ने कॉर्पोरेट वर्ल्ड के इस नए ट्रेंड के बारे में जानकारी दी. अभिनव के मुताबिक सीएसआर के ज़रिए बड़ी कंपनियां समाज और समाज में रहने वालों लोगों के लिए समाजसेवा के काम करती हैं और इसके लिए कंपनी अपने बजट का कुछ हिस्सा देती है.
अभिनव ने बताया कि, “कोई भी कंपनी हो वो काम करती है और उससे फायदा कमाती है तो ये माना जाता है कि वो समाज में जो चीज़ों हैं उनके इस्तेमाल से ही फायदा कर रही है. इस कारण सरकार की नीति कहती है कि कंपनी को इसे समाज को वापस लौटाना चाहिए. सरकारी नीति के अनुसार कंपनी अपने आखिरी तीन साल के फायदे के औसत का 2 फ़ीसदी हिस्सा समाज के विकास के लिए खर्च करेगी.”
“ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर भी समाज ही का हिस्सा है और कंपनियां आज के दौर में इसे ब्रांडिंग के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं. हर कंपनी कहीं ना कहीं कोई ना कोई सामाजिक कार्य करती है, लेकिन जब ऐतिहासिक धरोहर की बात आती है तो इसके लिए सरकार से इजाज़त लेनी होती है. इसमें कंपनी पैसे खर्च तो करती है लेकिन सरकार और कंपनी के बीच पैसों का लेन-देन नहीं होता.”
ऐतिहासिक धरोहरों के लिए ये कहता है कानून
1947 में आज़ादी के वक़्त देश की 2826 ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित की श्रेणी में रखा गया था. साल 2014 तक संरक्षित धर्तोहरों का ये आंकड़ा 3650 तक पहुँच गया था. भारत में ऐतिहासिक धरोहरों की देखरेख पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग यानी एएसआई के हाथों में है. संविधान का अनुच्छेद 42 और अनुच्छेद 51A(f) राष्ट्रीय और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को राष्ट्रीय कर्तव्य घोषित करता है. ये काम Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act 1958 के तहत संचालित होता है. राष्ट्रीय महत्व के सभी धरोहरों का संरक्षण एएसआई की जिम्मेदारी है. इस अधिनियम की धारा- 4(1) केंद्र सरकार को ये अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐतिहासिक इमारत या अन्य धरोहर को राष्ट्रीय महत्व का घोषित कर दे.
संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत राज्य सरकार अपने क्षेत्र में आने वाली राष्ट्रीय महत्व की ऐतिहासिक धरोहरों, इमारतों, आलेखों के संरक्षण और सुरक्षा की ज़िम्मेदार होगी. राज्य सरकार इस बात की तस्दीक करेगी कि किसी भी धरोहर को कोई भी समूह या व्यक्ति नुकसान न पहुंचा सके. राज्य सरकार किसी भी रूप में राष्ट्रीय इमारतों को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों को रोके, तोड़फोड़ से संरक्षित करे. उसे हटाने, उसमें बदलाव की कोशिशों से संरक्षण प्रदान करे. संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 49 को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल कर ये सुनिश्चित किया कि राष्ट्रीय महत्व के ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण और उनका नियमन सरकार की जिम्मेदारी होगी.
इसमें ऐतिहासिक धरोहरों के आसपास के 200 मीटर तक के इलाके में किसी भी तरह के संरचनात्मक बदलाव को रोकने का निर्देश भी शामिल है. ऐतिहासिक धरोहरों के पास सुविधाओं के विकास के लिए सरकार अपने नियंत्रण में कुछ बदलावों की अनुमति दे सकती है लेकिन इसे धरोहर के बुनियादी संरचना पर कोई असर न हो. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर सरकार को ज़रूरी निर्देश दिए हैं.
2010 में नेशनल मान्युमेंट अथॉरिटी के अस्तित्व में आने के बाद ऐतिहासिक धरोहरों के आसपास के 100 मीटर की परिभाषा को पुनर्परिभाषित किया गया और इसे निर्माण निषेध इलाका घोषित किया गया. इसके अलावा 100 से 300 मीटर के इलाके में सुविधाओं के विकास के लिए नियमों में भी कुछ बदलाव किए गए लेकिन वो भी सरकारी नियंत्रण के अनुसार ही संभव हो सकते हैं. किसी भी ऐतिहासिक इमारत की मूल संरचना में सिर्फ मरम्मत का काम हो सकता है उसकी संरचना में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया जा सकता. ऐतिहासिक धरोहरों पर नियंत्रण पूरी तरह सरकार का ही होगा और जो भी वहां काम होगा वह कानून के तहत और एएएसआई की देखरेख में ही हो सकता है.

महविश रज़वी

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