23 मार्च 1931 को भारत की तत्कालीन ब्रिटिश राज सरकार द्वारा फांसी चढ़ाये गए भगत सिंह को पंजाब सरकार ने शहीद का दर्जा देने से मना कर दिया है। सरकार ने दावा किया है कि किसी को भी आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा नही दिया जा सकता।

दरअसल पंजाब के एक वकील ने याचिका डाल कर पंजाब सरकार से पूछा था कि ब्रिटिश राज में फांसी की सज़ा पा चुके क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को शहीद का दर्जा दिया गया है? वकील ने शहीदों की आधिकारिक सूची की भी मांग की थी। इस याचिका के जवाब में सरकार ने संविधान की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि सरकार किसी को भी शहीद का दर्जा नही दे सकती। उसके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है।
पंजाब सरकार ने अपने इस फैसले में 12 दिसम्बर 2017 को बीरेन्द्र सांगवान वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स नाम के केस का भी हवाला दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सुनाये गए इस फैसले में कहा गया था कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को शहीद का दर्जा नही दिया जा सकता क्यूंकी याचिकाकर्ता का कोई संवैधानिक अधिकार नही है। कोर्ट ने दलील दी थी कि इस वजह से इस याचिका को खारिज किया जाता है।

गौरतलब है कि पंजाब में काफी लंबे समय से भगत सिंह, सुखदेव और और राजगुरु को शहीद का दर्जा दिलाने की मुहिम चल रही है। भगत सिंह और उनके साथियों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज़ अफसर सैंडर्स को मार दिया था। इस कृत्य के लिए तत्कालीन सरकार ने उन्हे 23 साल की उम्र में सज़ा-ए-मौत दे दी थी।

दिलचस्प बात ये है कि भगत सिंह को पाकिस्तान में भी शहीद का दर्जा दिलाये जाने की मुहिम चल रही है। वहाँ भी कई सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से ये लड़ाई लड़ रहे हैं। बता दें कि भगत सिंह और उनके साथियों को पाकिस्तान के लाहौर में ही फांसी दी गयी थी।
महविश रज़वी

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