2019! एक ऐसा वर्ष जो भारतवर्ष के लिए बहुत खास है। इसी वर्ष भारत मे लोकसभा के चुनाव होंगे। इस बार लोकसभा के चुनावों के नतीजे क्या रहेंगे इसका तो उसी समय पता चलेगा, लेकिन पिछेल कुछ 1-2 सालो में देखे तो जिस पार्टी की लोकप्रियता पूरे भारत के राज्यो में बनी हुई थी अब धीरे-धीरे उसकी लोकप्रियता में कमी आने लगी है। इसका सीधा मतलब ये ही है कि या तो जनता को अपने साथ धोखा होने का आभास हुआ या कुछ ऐसे कार्य जिनसे जनता का सरकार की तरफ से विश्वास उठ गया है।

ऊपर एक शब्द का प्रयोग किया गया विश्वास! यह एक ऐसा शब्द है जो दो देशों,धर्मो, राज्यो से लेकर एक बड़े संख्या समूह को जोड़ता है। 2014 में बीजेपी के आगमन के समय लोग बीजेपी को नही बल्कि मोदी को वोट दे रहे थे और दे भी रहे हैं। लेकिन पार्टी द्वारा जनता की आकांक्षाओं पर पूर्ण रूप से खड़ा न हो पाने के कारण या कुछ असफलताओं के कारण आज इस शब्द का पक्षीय पार्टी के लिए महत्व और प्रयोग कम होता जा रहा है।

2016 में नोटबन्दी और फिर जीएसटी के लागू होने पर लोग दो पक्षो में बंट गए। कोई पक्षीय तो कोई विपक्षी पार्टी की तरफ चला गया। यह पहली बार नही है कि किसी मुद्दे पर लोग दो गुटों में विभाजित हुए हो यह तो स्वतन्त्रता के बाद से अधिकतर बड़े मुद्दे पर हुआ है। लेकिन मुद्दा ये नही की इससे(नोटबन्दी) नुकसान कितना हुआ जो हुआ वो जनता के सामने सब स्प्ष्ट है। मुद्दा आखिर यह है कि इससे फायदा कितना और क्या हुआ? आखिर नोटबन्दी लागू करना कोई गलत नही था लेकिन जब बड़े-बड़े कारोबारी और नेताओ के काले धन पकड़े जाते तब यह कारगर साबित होता भी लेकिन किसी भी बड़े उद्योगपति या नेता का नाम तक भी सामने नही आया। अन्य सरकारों की तरह मोदी सरकार की तरफ से कई बड़े बड़े वादे किए गए जैसे गंगा की सफाई ,बैंको में पैसे आना इत्यादि। लेकिन उन वादों को पूरा नही किया जा सका।

अब पार्टी के अध्य्क्ष अमित शाह को राम जी की, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के बाप की उपाधि उन्ही के कार्यकर्ताओं द्वारा दे दी जा रही है। किसी भी पार्टी के नेता लोग ये क्यो भूल जाते हैं कि राम,अल्लाह या गुरुगोविन्दसिंह जी जैसो की तुलना किसी मानव से करना उचित नही है। जनता द्वारा की गई तारीफ ही किसी पार्टी के लिए उसके कार्यकाल के दौरान किये गए कामो को प्रत्यक्ष रूप से रखती है।

पार्टी ने बेशक 29 में से 21 राज्यो पर अपनी सत्ता बनाए हुए रखी हो लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि कितने राज्यो में बीजेपी अकेले सरकार बनाए हुए है और कितने राज्यो में बीजेपी को दुबारा उसी राज्यो में जीत मिली।
बीजेपी की 2019 में जीत की संभावना कुछ हद तक तो कम हुई है क्योकि मोदी का गढ़ कहे जाने वाले राज्य यानी गुजरात मे सिर्फ 99 सीटो का मिलना जनता की असन्तुष्टि को स्पष्ट करता है।

बीजेपी के आगमन से भारत के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी अच्छे संबंध बने और भारत की छवि भी सुधरी लेकिन बाहरी देशो के दौरे के कारण आंतरिक रुप में सरकार काम करने में असफल तो रही है। बढ़ती महंगाई,रेप, भ्रष्टाचार को बेशक जड़ से हटाना या खत्म करना बहुत मुश्किल है लेकिन उनकी संख्या में कमी करना तो सरकार का ही दायित्व है। अगर इन सभी विषयों की बात की जाए तो कम होना तो दूर इनकी संख्या दुगनी रफ्तार से बल्कि बढ़ी ही है ।

वही दूसरी तरफ कांग्रेस जिनके अध्य्क्ष राहुल गांधी हैं। जिनकी राष्ट्रीयता और भाषा को लेकर समय-समय पर सवालात उठते रहे हैं। ये बात सच है कि राहुल में मोदी जैसी बोलने और भाषण की क्षमता नही है। उन्होने अपने ही कई बयानों में खुद को गिराने का काम भी किया है। आज की जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक तरफ मोदी दूसरी तरफ राहुल तो जनता जाए किधर? इसका हल जनता को खुद ही ढूंढना होगा क्योकि पार्टी के कामो की तुलना उन्हें स्वयं ही करनी होगी क्योकि आज हर चीज व्यवसायी से जुड़ चुकी है, जिस कारण जनता को समझदार खुद ही बनना होगा।

पार्टी के अच्छे या बुरे कामो को गिनाकर लोगो की सोच बदली जरूर जा सकती है लेकिन यह बात सच है कि आखिर जीतता अंधविश्वास ही है। यह अंधविश्वास धर्म, भाषा या लिंग के आधार पर तय होता है और इसको तय करने वाले लोग ही समाज को एक दलदल में फसाने का कार्य करते हैं।

अखिल सिंघल

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