अगर हम लैंगिक पहचान और भिक्षा मांगने की परम्परा को अलग अलग नजर से देखें तो ही हम लैंगिक पहचान को समझ पाएंगे.
लेकिन हम हर इंसान को उसके स्टेटस और उसके कार्य से देखते है. दुनिया में मर्द और औरत के द्वारा किया कार्य समाज में स्वीकार्य है और वह तमान तरह के सामाजिक कार्यों में सम्मलित है, लेकिन Transgender को और उसके द्वारा किया हर कार्य विचित्र मान लिया गया है और उसको नाचने और भिक्षा मांगने के अलावा समाज ने दिया ही क्या है इस कार्य पर भी अब यही समाज प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं.

हम Transgender को तब तक नहीं समझ पाएंगे जब तक हम उनको उनके कार्य से तोलेंगे और जब तक हम उनके कपड़ों के अंदर क्या है की खोज करना बंद नहीं करेंगे. अगर हमे उनको जानना है तो उनके साथ रहना होगा उनको अपनाना होगा. उनके अंदर छुपे तरह-तरह के रंगों को जानना होगा और उनके भीतर छुपे प्राकृत कलाओं को जानना होगा.

Transgender सामाजिक बंधनो से दूर रहते हैं परिवार को संरक्षण देना उनका हुनर हो सकता है लेकिन परिवार बढ़ाना शायद उनका हुनर नहीं. इसमें भी कुछ लोग मेरे असहमत हो सकते हैं कि वह माँ या बाप बनना चाहते होंगे लेकिन बैलोजिकली ऐसा अभी संभव नहीं है या यूँ कहें की प्रकृति ने उनको ऐसा नहीं बनाया कि एक मर्द औरत बनने के बाद माँ बन सकती है या एक औरत मर्द बनने के बाद बाप बन सकता हो. लेकिन जिस सेक्स/ Biological body में वह पैदा हुए हों उस body में रह कर वह यह सब कर सकते हैं.

इंटरसेक्स जिनके लिंग विकृत होते हैं या जिनके लिंग की पहचान नहीं हो पाती कि वह मर्द हैं या औरत वह अपने आप को ट्रांस जेंडर, मर्द या औरत घोषित कर सकते हैं उनकी भी समस्याएं काफी हद्द तक Transgender लोगों की तरह होती है मेरे विचार में तो उनकी स्थिति गेंहूं में घुन पीसने जैसी हो गयी है. मनोविज्ञानिक रूप से वह भी उसी तरह असामंजस्य की स्थिति में रहते हैं जैसे एक Transgender बच्चा. एक Trans women (biological male) यह सोचती है कि वह Penis ( पुरुष लिंग ) के साथ एक औरत है और एक Trans man यह सोचता है कि वह vagina (स्त्री लिंग ) के साथ एक मर्द है.

इंटरसेक्स इंसान भी यही सोच सकता है जैसे एक Trans man or Trans women सोचते हैं.
और वह हमेशा अपने शरीर के अंगों को बदलने के बारे में सोचते हैं क्यूंकि उनको लगता है की वह गलत शरीर में पैदा हो गए हैं. इसके लिए काफी दर्दनाक सर्जरी से गुजरना होता है जो बहुत खर्चीली भी होती है लेकिन ट्रांस के लिए यह दर्द ज्यादा दुःख नहीं पहुंचता क्यूंकि समाज का दिया हुआ दर्द उनको ज्यादा लगता है रोज रोज का छक्का, हलवा, मामू, हिजड़ा, ख़ुसरा तमाम तरह के नामों से बुलाया जाना उनको मानसिक प्रताड़ना और दुःख देता है गलत और भद्दी गलियां देना एक सामाजिक बुराई है.
समाज ने और सरकारों ने कभी इस और ध्यान नहीं दिया. लोग यही सोचते रहते हैं की यह सब लोग जानबूझ कर करते हैं और ये सब नकली हैं. लोगों को क्या पता की शरीर के बाहरी अंगों से ज्यादा अंग हमारे शरीर के अंदर हैं और वह दिखाई नहीं देते उनमे दिमाग सबसे महत्वपूर्ण है जो हमारे पुरे शरीर को निर्देश देता है. अगर हमारा दिमाग न हो तो न हम मर्द रहेंगे और न ही औरत.

Dhananjay Chauhan ( Member of Transgender Welfare Board, Chandigarh and President of Saksham Trust)
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