तकलीफ ये नही है कि एक मुसलमान होने के नाते अपनी देशभक्ति की सफाई देनी पड़ती है। उसका सबूत देना पड़ता है। तकलीफ ये है कि आप हज़ार बार सुनने और देखने के बाद भी हमारी वफादारी और वतनपरस्ती पर भरोसा नही करते।

खालिस्तान की मांग करने के बावजूद धोखे से भी किसी सिख को कभी ये नही सुनना पड़ता कि देश छोड़कर चले जाओ। उन्हें देशद्रोही या गद्दार कहने का सोचा भी नही जाता। लेकिन हमारे लिए कोई ऐसा मौक़ा नही छोड़ा नही जाता जब हमे ये न याद दिलाया जाता हो कि हमारे जैसे नाम वाले लोग कही और भी बसते हैं। हमे हर क़दम पर वही रटा रटाया अतीत याद दिलाना पड़ता है कि हमारे बाप-दादा यहां रुके क्योंकि वो रुकना चाहते थे। उन्होंने किसी पाकिस्तान या किसी ऐसे मुल्क की उम्मीद नही थी जहाँ सिर्फ एक ज़ात के लोग हो। वो यहीं रुके क्योंकि उन्हें भरोसा था कि भाई सिर्फ खून के रिश्तों से नही बनते। वो सिर्फ माँ के पेट से पैदा नही होते। भाई वो होता है जो आपके साथ खड़ा रहे फिर वक़्त चाहे कितना भी खराब हो।
पर अफसोस… 70 साल हुए और हम भाईचारा साबित नही कर पाए। साबित न हो पाने की वजह भी क्या? कि दूर मुल्क में कुछ लोग इस मुल्क को पराया बताकर चले गए और हम यही रह गए क्योंकि हम आपको भाई मानते हैं। आप उनकी गलतियों से हमारी वफ़ादारियाँ तोलते हैं मगर हमारी वफ़ादारियाँ आपको हमे प्यार देने से रोक देती हैं। क्या हसीन और मुतमईन करने वाला दोगलापन है।

हमे इस देश के सिनेमा… सिनेमा वो चीज़ जिसे मनोरंजन के तौर पर देखा जाता है। उस मनोरंजन में भी हम अपनी ख़ुशमिज़ाज नही बल्कि एक प्रताड़ित छवि ही देख पाते हैं। पिछले 10 साल या 20 सालों में ही आप एक फ़िल्म उठाकर दिखा दीजिये जिसमें हमे एक प्रताड़ित और वफादार नागरिक के तौर पर पेश न किया गया हो। जहां बार-बार हमें दशकों पुराना रटा रटाया डायलॉग न बोलना पड़ा हो कि हम यहीं थे और यहीं रहेंगे। यहां के होकर रहेंगे। देशभक्ति पर बन रही फिल्मों का ट्रेंड चल रहा है लेकिन उस ट्रेंड में भी इस मुल्क के कहानीकारों तक को एक भी मुसलमान नायक याद नहीं आ रहा। यहाँ तक कि जो नायक हैं भी उन्हें इतने भद्दे तरीके से पेश किया जा रहा है कि आपके लिए उनका अस्तित्व मायने नही रखता। पिछले दिनों रिलीज़ हुई फिल्म “परमाणु” में पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का रोल इस बात की बानगी भर है।

खुश होइए की हमारी बेईज्ज़ती की कड़ी में हाज़िर है एक और फ़िल्म… “मुल्क”। प्रताड़ित मुसलमान का किरदार भी प्रमाणित देशभक्त श्री ऋषि कपूर साहब निभा रहे हैं। देखिये हमारी सच्चाई फिर से बिकने को तैयार है। आप फ़िल्म देखकर कहेंगे कि हाँ देखो हर मुसलमान आतंकवादी नही होता। लेकिन इस पर यक़ीन आप तब भी नही करेंगे। और ये बॉलीवुड… एक बार फ़िर से तैयार है किसी मज़लूम की कहानी बेचने को। लेकिन हमेशा की तरह इस सौदे से कमाई गयी रक़म का रत्तीभर भी उस मज़लूम तक नही पहुंचेगा। फिर चाहे वो इज़्ज़त ही क्यों न हो। एक अदद बिना छींटाकशी की सुबह ही क्यों न हो।

ये धीमा ज़हर हमे नहीं मार सकता क्यूंकि हमारे खून में, हमरी किताबों में वतनपरस्ती की ताकीद की गयी है। हम भोल ही नहीं सकते कि हम इस मुल्क्के बाशिंदे हैं और कितनी भी बुरी स्थिति देश से गद्दारी की इजाज़त नहीं देती। ये नफरत, ये बेवजह की तकलीफ आपकी नस्लों को ख़राब कर रही है। आपकी पीढ़ियों के दिमाग में ज़रूरी चीज़ों की जगह बेकार उम्मीदें पनाह ले रही हैं जिनका कोई रूप नही है। जब खाने के लिए हर चीज़ ख़त्म हो जाती है तो एक सांप अपनी ही औलाद से अपनी भूख मिटा लेता है। वो ये नही देखता कि निवाला कौन है, उसे सिर्फ अपनी भूख दिखती है।

महविश रज़वी

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