जब हम प्यास लगती है तो हम क्या करतें है? हम पानी पीतें है,जब हम भूख लगती है तो हम खाना खातें है. है ना ये सीधा सीधा प्रोसेस है जिसे हम अपनाते है,लेकिन जब हमे नौकरी की ज़रूरत होती है तो हम क्या करतें है? जब हमे मालूम चलता है कि हम बेरोज़गार है तो क्या करतें है? हमे नौकरी नही मिल रही होती है तो ये सरकार की नाकामी होती है मगर क्या हम सरकार से सवाल करतें है? असल मे हम करना तो चाहतें हैं मगर उससे भी पहले कोई फेक आईडी दूसरे नाम से कही और नफरत फैला रही होती है मगर क्यों?

आखिर क्यों एक नेता ये तय करता है कि कब हम क्या डिमांड करें,कब हम किसी चीज़ को मांगे कब ये पूछे कि हमारी सड़क की सफाई क्यों नही हुई. असल मे उससे पहले ही हमे एक “टुकड़ा” ऐसा मिल जाता है जो हमें जानवर से भी बदतर बना देता है. वो हमे इस बात के लिए मजबूर करता है कि तुम इस चीज़ के खिलाफ खड़े रहो इसके नही. वो हमें ये बताता है कि “आसिफा” के बलात्कारियों के खिलाफ खड़े होने वाले “संस्कृति” के खिलाफ नही खड़े हैं,और हम इस बात को मान लेतें है? क्या हमारे पास अक्ल नही है?

आखिर कैसे बलात्कार को आप कमतर या बदतर या ऐसा या बुरा मान सकते है? कैसे ये मान सकतें है कि आपके धर्म की लड़की का बलात्कार हुआ तो गलत हुआ,और दूसरे धर्म की लड़की का बलात्कर हुआ तो वो गलत नही है? क्यों आखिर इस तरह की चीज़ों की ज़रूरत आ गयी है? और वो कौन लोग है जो ये आंकलन करतें हैं? इन्हें पहचान लेना ज़रूरी है वरना ये लोग बलात्कर को कम उसे करने वाले के धर्म को ज़्यादा ढूंढेंगे।

मगर ये सब तो हो रहा है. और हो इसलिए रहा है की मुद्दे की बात न हो. युवा बेरोज़गार है उस पर बात न हो. यूपीएससी की सीटें कम हो गयी हैं उस पर बात न हो. कोई ये न बताएं कि 12 करोड़ लोग बेरोज़गार है,उन्हें नौकरियां मिल ही नही रही है. सवाल ये है मगर इस सवाल को करे कौन?

इस सवाल को करने के लिए वो चश्मे उतारें जाने ज़रूरी है जो “धर्म” का बिजनेस करने पर उतारू है,वो जो सोशल मीडिया पर “चींख” रहे हैं उन्हें अपने चश्मे उतारने होंगे और अपने मुद्दे के सवाल अपने नेताओं से करने होंगे,क्योंकि अगर ये सवाल नहीं होंगे तो बेहतरी नही होगी और बेहतरी ही नही होगी तो हम आगे कैसे बढ़ेंगे? सवाल ये है…

असद शैख़

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