वरिष्ठ वकील शांति भूषण की याचिका पर सुनवायी करते हुए उच्च न्यायालय ने एक बार फिर कहा है कि चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया के पद की जिम्मेदारियों पर टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि सीजीआई ही मास्टर ऑफ रोस्टर हैं। उनकी भूमिका ‘समकक्षों के बीच प्रमुख’ की होती है और उन पर मामलों को आवंटित करने का विशिष्ट दायित्व होता है। केसों के आवंटन में CJI का मतलब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया है ना कि कॉलेजियम। कोर्ट ने भूषण की अर्जी पर दखल देने से इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी व्यवस्था अचूक नहीं होती। न्यायपालिका की कार्यप्रणाली में सुधार की हमेशा गुंजाइश रहेगी।

वरिष्ठतम हैं इसलिए अधिकार है
मामले की सुनवायी करते हुए जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने कहा कि “चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ही मास्टर ऑफ़ रोस्टर हैं और उनके पास अलग-अलग बेंचों को केसों के आवंटन करने का अधिकार है इस बात में कोई विवाद नहीं है। यह विशेष कर्तव्य उन्हीं का है। वरिष्ठतम होने की वजह से वे अदालत के प्रशासन का नेतृत्व करने का अधिकार रखते हैं।”
उन्होंने कहा संविधान सीजीआई मुद्दे पर मौन है लेकिन परपंरा और बाद के फैसलों में सभी द्वारा माना गया है कि सीजीआई बराबर में सबसे पहले हैं। उन्होंसने आगे कहा कि हम जवाबदेही के वक्त में रह रहे हैं। तकनीक के वक्त में कोई भी आउटकम आलोचना में बदल सकता है। दुनिया तेजी से बदल रही है लेकिन फंडामेंटल्सत नहीं बदलेंगे। क्या चीफ जस्टिस दूसरे जजों की सलाह से काम करते हैं?

ये थी याचिका
कानून मंत्री और वकील शांति भूषण ने याचिका के ज़रिये मांग की है कि 5 वरिष्ठतम जज मिल कर मुकदमों का आवंटन करें। बता दें कि आमतौर पर याचिकाएं सीधे रजिस्ट्री द्वारा जजों के पास चली जाती हैं। सिर्फ संवेदनशील मामलों को ही रजिस्ट्री चीफ जस्टिस के पास बेंच के लिए पूछती है।
याचिकाकर्ता शांति भूषण का कहना था कि हमने याचिका में 14 केस बताएं हैं जिनमें अस्थाना का केस भी शामिल है। इसलिए ऐसे संवेदनशील मामलों में केसों के आवंटन के लिए कॉलेजियम को तय करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ को ‘बेकाबू और बेलगाम’ विवेकाधिकार नहीं दिया जा सकता। उनका आरोप था कि चीफ जस्टिस इसका इस्तेमाल एकतरफा करते हैं और चुनिंदा जजों की बेंचों को चुनते हैं या खास जजों को मामले सौंपते हैं। ये देश की सबसे बड़ी अदालत है जिसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करनी है। चार वरिष्ठ जज इस मुद्दे को लेकर जनता में चले गए।

कोर्ट की टिप्पणी
चीफ जस्टिस के मास्टर ऑफ रोस्टर के तहत केसों के आवंटन पर सवाल उठाने वाली शांति भूषण की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की ये बात स्वीकार करना मुश्किल है कि केसों के आवंटन में सीजीआई का मतलब कॉलेजियम है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल (AG) से केस में सहयोग मांगा था कि जजों की नियुक्ति का तरह क्या संवेदनशील केसों के आवंटन के मामले में CJI का मतलब कॉलेजियम होना चाहिए?

वही बात दोहरायी
बता दें कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट नवम्बर 2017 के अपने फैसले में कह चुकी है कि इसमें कोई विवाद नहीं कि CJI मास्टर ऑफ रोस्टर हैं। प्रथम दृष्टया हमें ये लगता है कि इन हाउस प्रक्रिया को दुरुस्त कर इसका हल हो सकता है, न्यायिक तरीके से नहीं।

पहले भी हो चुका है विवाद
सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने जनवरी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केसों के आवंटन का मुद्दा उठाया था। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसके बाद अप्रैल में पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

हिंदी गैजेट टीम

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