“माँ के हाथ का खाना” एक ऐसा विषय जिसकी व्याख्या करनी थोड़ी जटिल है क्योकि माँ अर्थात संसार,जीवन का सार। दुनिया मे सबसे प्यारा और विश्वास का रिश्ता माँ का होता है और जब बात माँ के हाथ द्वारा बने खाने की आती है तो खाने के साथ माँ का नाम जुड़ते ही उस खाने का स्वाद खुद ही बढ़ने लगे जाता है। बाहरी खाना हो या किसी ओर के हाथो का खाना उसकी तुलना माँ के हाथ से बने खाने से नही की जा सकती। यह बात बिलकुल सत्य है। क्योकि माँ के हाथों द्वारा बनाए गए खाने में एक चीज जो उसे स्वादिष्ट बनाती है वह होता है उस में शामिल उनका प्यार। माँ अपने बच्चों के लिए प्यार भरे मन से खाना बनाती है तथा रात के समय भी बच्चो को भूख लगने पर माँ अपने बच्चो के लिए खाना बनाने में नहीं ऊबती। यही चीज औरों के खाने से अलग बनाती है।

आज एकल परिवार होने तथा महिलाओ द्वारा नौकरी करने से बच्चे अपनी माँ के हाथ के बने खाने से दूर होते जा रहे हैं,जिस कारण अच्छे स्तिथि वाले घरों में तो कुक तक रख लिए जाते हैं। परंतु उनके हाथ से बने खाने में भी माँ के हाथ से बने खाने जितना स्वाद नही होता। कुक औऱ माँ की तुलना इसलिए भी नही की जा सकती क्योकि कुक को अपनी रोज़मर्रा की खुराक से ज्यादा खाने को कह देने से उस पर खाना बनाने में जोर पड़ेगा जबकि इसी जगह अगर बच्चो द्वारा अपनी माँ को आधी रात में भी खाना बनाने को कहा जाए तो वह खाना बनाने से कभी इनकार नही करेगी।
एक लेखक ने एक बहुत ही अच्छी बात लिखी है-
“मेरी माँ आज भी अनपढ़ है
मांगता हूं एक रोटी लाके दो देती है”
यह लाइन बहुत कुछ स्पष्ट करती है क्योकि माँ अपने बच्चो को कभी गिनी हुई रोटी नही खिलाती। उसी जगह सारे रिश्तों में ज्यादा रोटी खाने पर या तो टोक दिया जाएगा या ना बनाने के सौ बहाने ढूंढ लिए जाएंगे। लेकिन एक माँ अपने बच्चो का पेट भरने के लिए खुद के मुंह का निवाला भी दे देगी।

बड़ी -बड़ी डिग्री, नौकरी के लिये बच्चे अपने घर से दूर चले जा रहे हैं, लेकिन घर की सबसे ज्यादा याद करने वाली चीज उनके लिये माँ के हाथ का खाना ही होता है। माँ के हाथ जैसा स्वाद उन्हें बाजार में भी नही मिलता, क्योकि बाजार में बिकने वाले खाने का उद्देश्य पैसा कमाना होता है जिस कारण वे लोग खाना बनाने में कई-कई दिन की रखी सब्जियों का इस्तेमाल करते हैं, तथा अधिक तेलयुक्त तथा बासी खाना होता है, जबकि घर मे माँ अपने बच्चो के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ताजी सब्जियो को धो धाकर, उनमे सही रुप से से मसाला डालकर खाना बनाएगी ताकि बच्चो को खाना खाने में कोई दिक्कत ना आये। माँ के हाथ के बने खाने में प्यार के साथ-साथ एक रसात्मक प्यार भी होता है। तभी वह स्वाद के साथ साथ पौष्टिकता से भरपूर होता है।

भारतीय संस्कृति पूरे विश्व मे अपनी अच्छी छवि,प्यार तथा करुणा के लिए प्रसिद्ध है हमारे देश मे माँ और बच्चो के संबन्ध ना केवल मानव जाति में अपितु जानवरो में भी पाया जाता है। एक पशु माँ भी अपने बच्चो के भोजन की तलाश में इधर-उधर कई-कई घण्टो तक भटकती रहती है और भोजन की प्राप्ति होते ही सबसे पहले अपने शिशु का पेट भरती है। जबकि अन्य जानवर शिशु के मृत्यु की ताक मे रहते हैं।

एक पुरनी कहावत “जैसा अन्न वैसा मन” के अनुसार माँ अपने बच्चो के पसन्द को ध्यान में रखते हुए खाना बनाती है ताकि बच्चो को खाना पसंद आ सके ताकि जिससे वो खुश रह सके और अपने काम मे ध्यान को अच्छी तरह पूरी लगन के साथ कर पाए क्योकि कभी खभी अच्छा खाना और मनपसन्द ना मिलने से बच्चे रुठ जाते है जिस कारण माँ इन सब चीजो को ध्यान में रखकर ही खाना बनाती है। अपने बच्चो के सही स्वास्थ्य के लिए माँ उसे हरी सब्जियां,फल और दूध को लेने के लिए कहती रहेगी क्योकि इन सब चीजो में पौष्टिकता सबसे अधिक होती है इसके विपरीत कोई अन्य किसी भी बच्चे को खाने के लिए इतना नहीं कहेगा। “स्वस्थ शरीर मे ही स्वस्थ दिमाग का निवास ” होता है जिसे ध्यान में रखते हुए माँ अपने बच्चो की सेहत के लिए पूरी सचेत रहती हैं।

घर मे माँ द्वारा तैयार खाने को बच्चो द्वारा जब कभी नकार दिया जाता है तो किसी भी माँ को यह बहुत बुरा लगने वाली बात होती है, क्योकि इतने प्रेम के साथ बनाया गया खाना को ठुकराकर बाहरी खाने को महत्व देना अच्छी बात नही है। अपनी माँ के हाथो का बना खाने ओर उस स्वाद की याद का दर्द उनसे बेहतर कोई नही समझ सकता जो अपनी माँ से दूर रहकर बाजारों में खाते है या खुद बनाते है क्योकि गर्मी हो या सर्दी माँ हर मौसम में बच्चो के लिए पौष्टिक खाने ही तैयार करती है।

अखिल सिंघल

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