तस्वीर सोशल मीडिया से ली गयी है

पहले हिस्से में मैंने लिखा था कि हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ो के खिलाफ पहला फतवा “हज़रत शाह” ने दिया था और हिंदुस्तानी आवाम का दर्द देखते हुए अंग्रेज़ो से टक्कर लेने की सोच ली थी.

“हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ रहo” ने सबसे पहले काम ये किया कि 1808ई में “महाराजा जसवंत राव हुल्कर” और उनके मुँह बोले भाई ‘नवाब अमीर खान” ने जब अंग्रेजों के खिलाफ महागठबंधन कायम किया तो आपने अपने ख़ास मुरीद और अकीदत मंद “हज़रत सयैद अहमद रायबरेलवी” को “नवाब अमीर खान” की फ़ौज में शामिल होने का हुक्म दे दिया। सयैद साहब लगभग 7 साल उस फ़ौज में रहे और जब अपने ये देख लिया की “नवाब अमीर खान” भी अंग्रेजों से सुलह का इरादा रखते हैं तो 1816ई में आप उस फौज से अलग होकर दिल्ली आ गए…

उसके बाद यह तय हुआ की “सयैद अहमद रायबरेलवी” के नेतृत्व और “हज़रत शाह इस्माइल शहीद” और “हज़रत मौलाना अब्दुल हई” जैसे बड़े बड़े उलेमा के मशवरे से एक जमात बनाई जाए जो पूरे मुल्क का दौरा कर के जनता में इंक़लाब पैदा करे…
उस वक़्त “हज़रत अहमद सयैद शहीद” ज़िम्मेदार थे और उनकी उम्र 40 साल थी जबकि “मौलाना अब्दुल हई” की अम्र 50 साल और ‘हज़रत शाह इस्माइल” की उम्र 48 साल थी

जारी है…

#जंग_ए_आज़ादी_में_मुसलमान
#भाग_2

इमरान

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