पिछले हिस्से में लिखा था की “हज़रत अहमद सयैद शहीद” के नेतृत्व में एक काफिला निकला जिसका काम आम जनता में इंक़लाब पैदा करना था

काफिला दिल्ली रवाना हुआ, इस तहरीक के सबसे बड़े सरपरस्त “हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़” ने रवानगी के वक़्त अपनी काली पगड़ी और कुर्ता “हज़रत अहमद सयैद शहीद” को दिया और रास्ते के लिए थोड़ा सामान भी दिया.

वैसे तो इस काफिले का असली मकसद लोगो के अंदर इंक़लाब पैदा करना था लेकिन ज़ाहिरी तौर पर इस काफिले को समाज सुधारक करार दिया गया. ऐसा करने की ज़रूरत दो बातों से थी पहली की बिना समाज सुधार किये इंक़लाब लाना मुश्किल था और दूसरी मुश्किल थी की अंग्रेज़ो के इतने बड़े साम्राज्य के सामने ज़ाहिरी तौर पर इंक़लाब का नारा लगाना भी सही नही था.

“हज़रत अहमद सयैद” दिल्ली से गाज़ियाबाद, मुरादनगर, मेरठ, सरधना, बुढ़ाना, फुलत, मुज़फ्फरनगर, देवबंद और सहारनपुर तशरीफ़ ले गए और आखिर में अपनी ज़मीन राय बरेली की खानदानी खानकाह “तकया शाह अलीमुल्लाह” में कुछ दिन ठहरे, फिर आप इलाहाबाद,कानपुर, बनारस, सुल्तानपुर तशरीफ़ ले गए और बाद में तीन महीने तक लखनऊ में ठहरे जो उस वक़्त अवध की राजधानी थी.

क्योंकि जैसा की इस काफिले का मक़सद समाज सुधार था तो आप जहाँ जहाँ तशरीफ़ ले गए गुमराही की हवाएं छटती चली गईं, आपने अपने साथियों के लिए ऐसे बयानात किये जिससे की हज़ारो की तादात में बेदीन लोगो ने तौबा करके सही रास्ता अपना लिया.

काफिले के इस दौरे से बहुत फायदा हुआ और लोगों से इंक़लाब की उम्मीद जागने लगी…

जारी है….
#जंग_ए_आज़ादी_में_मुसलमान
#भाग_3

इमरान

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