पिछले हिस्से में लिखा था कि किस तरह से “हज़रत सयैद अहमद” में सूबा सरहद को अपने जिहाद का केंद्र बनाया. इसकी कई वजह थी और शुरुआत में करीब 500 लोग आपके साथ थे लेकिन सूबा सरहद पहुँचते-पहुँचते तादात 1500 तक पहुँच गयी और बाकी भी पूरे हिंदुस्तान से लोग आने लगे.

लगातार ख़बरें आ रही थी की पंजाब में सिख सरकार और अंग्रेजों ने मिलकर अपनी अवाम पर ज़ुल्म की इंतेहा कर रखी है. “हज़रत सयैद अहमद” और उनके साथियों का सबसे पहला मुकाबला सिखों से 21 दिसंबर 1826ई में हुआ जिस में आपके 37 साथी शहीद और 35 साथी बुरी तरह जख्मी हुए, फिर भी ये मुक़ाबला जारी रहा. इस मुकाबले के बाद से इस काफ़िले की हिम्मत और बहादुरी के चर्चे दूर-दूर तक मशहूर हो गए, और इलाके के सरदार धीरे-धीरे सयैद साहब के इर्द गिर्द जमा होने लगे.

सयैद साहब का असल मुक़ाबला तो अंग्रेजों से था अब जबकि सिखों जी फ़ौज अंग्रेजों का साथ दे रही थी तो ज़ाहिर तौर पर सिखों से मुकाबला करना पड़ा. उस समय आपने एक खत ग्वालियर के राजा “हिन्दू राव” के नाम लिखा था जिसके अहम् हिस्से यहाँ लिखते हैं.

आप लिखते हैं,
जनाब को खूब मालूम है के वो बेगाना और अजनबी जो अपने प्यारे वतन हिंदुस्तान से बहुत दूर रहने वाले दुनिया जहान के मालिक बन गए और सौदा बेचने वाले दुकानदार बादशाह के दर्जे को पहुँच गये. बड़े-बड़े अमीरों की सरदारी और बुलंद मर्तबा,रईसों की रियासत को बर्बाद कर दिया और उन की इज़्ज़त और भरोसे को बिल्कुक खत्म कर दिया, क्योकि जो लोग रियासत और सियासत के मालिक थे उन्होंने गुमनामी की ज़िन्दगी इख्तियार कर ली है. मजबूर होकर कुछ खाली हाथ फ़कीर हिम्मत करके खड़े हो गए हैं कमज़ोरों की ये जमात सिर्फ अल्लाह के दीन के तकाज़े से इस खिदमत के लिए खड़ी हुई है. ये लोग दुनिया के लालची और किसी औहदे के तलबगार नही बल्कि एक मज़हबी और अख़लाक़ी फ़रीज़ा समझकर इस खिदमत के लिए उठे हैं जिन्हें माल और दौलत का बिलकुल लालच नही है. जिस वक़्त हिंदुस्तान का मैदान इन विदेशी दुश्मनों से खाली हो जाएगा और हमारी कोशिशों का तीर मुराद के निशान तक पहुँच जाएगा, तो सरकारी ओहदें उनके सुपुर्द होंगे जो उनके लायक़ हैं और उन्ही के मान मर्यादा की जड़ें मज़बूत की जाएँगी. हम कमज़ोरो को बड़े-बड़े मालदार और बुलंद मर्तबे वालो से यही चाहिए की वह इस जमात का सहयोग करें और सरकारी कुर्सियां उनको ही मुबारक हों.

इस खत से मालूम होता हूं कि सयैद साहब का असल मुक़ाबला अंग्रेजों से था अब ये अंग्रेज़ो की मक्कारी थी कि उन्होंने सिखों की फौज अपने फायदे के किये इस्तेमाल कर सयैद साहब के खिलाफ मैदान में उतार दी थी. अंग्रेज़ एक तीर से दो निशाने लगा रहे थे एक तो उन्होंने सिखों की मदद करके दोस्ती पक्की की और दूसरा उस दोस्ती को ढाल बनाकर उन्हें सूबा पंजाब में दख़ल अंदाज़ी का बहाना हाथ आ गया.

लड़ाई से पहले सयैद साहब ने एक खत सिखों के राजा “रणजीत सिंह” के नाम भी लिखा.
आप लिखते हैं
हम लोग न तेरे मुल्कों माल के तालिब हैं न तेरी जान और न ही इज़्ज़त,न ही हम नुक्सान पहुँचाना चाहते हैं न हमें लड़ने की तमन्ना है हम तो सिर्फ यह चाहते हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ तू हमारा साथी बन और हमारा साथ दे. दुश्मनों के साथ जिहाद करके हम तेरा मुल्क तेरे हवाले कर देंगे और अगर ये बात तुझे मंज़ूर नही तो फिर लड़ाई के सिवा कोई चारा नहीं.

और जब राजा “रणजीत सिंह” ने इस पैगाम को मंज़ूर नही किया तो उस के खिलाफ ऐलान-ए-जंग करना पड़ा…

जारी है…
इमरान

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