आम तौर पर 1857 में शुरु हुए विद्रोह को हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम का पहला आंदोलन कहा जाता है, जबकि एैसा कुछ नही है। 1757 ई. से लेकर 1857 ई. तक हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के विरुद्ध कई छोटा बड़ा विद्रोह चलता रहा। जहाँ कहीं स्थानीय धर्मगुरु, साधुसंत, फ़क़ीर, युवकों एवं विभिन्न जनजातियों तथा कृषक वर्ग ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ अनेकों बार संघर्ष या विद्रोह किया। पर 1857 में पहली बार स्थानीय लोगों को ज़मींदारों, क्षेत्रीय शासकों का साथ अंग्रेज़ों के खिलाफ़ संगठित रूप से मिला, जिसके फलस्वरूप 1857 के विद्रोह हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम का पहला आंदोलन कहा गया।

ये बात किसी से छुपी नही है जब किसी आंदोलन को पैसे वाले और ताक़तवर लोग का साथ मिलता है तो वो और मुखऱ हो जाता है, और यहां भी वही हुआ। दानापूर से दमदम तक, मेरठ से ले कर सीहोर तक जासूस के जाल बिछा दिए गए। तरह-तरह के प्रोपागेंडे और अफ़वाहों को हवा दी गई। जिसमे सबसे स्पष्ट रूप में चर्बी वाले कारतूसों की शिकायत के अफ़वाह का उल्लेख मिलता है। मेरठ से लेकर सीहोर तक के फ़ौजियों की यह शिकायत थी कि जो नये कारतूस फ़ौज में उपयोग किये जा रहे हैं उनमें गाय और सुअर की चर्बी मिली हुई है। सिपाहियों के ज़ेहन में ये बात डाला गया कि अंग्रेज़ हिन्दुस्तानियों के दीन-ईमान को ख़राब कर देना चाहते हैं, फिर क्या था हो गई बग़ावत!

10 मई 1857 को मेरठ छावनी की पैदल सैन्य टुकड़ी ने भी इस कारतूसों का विरोध कर दिया और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ बग़ावत का बिगुल बजा दिया। 12 मई 1857 को इन्ही विद्रोहियों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया और बहादुरशाह ज़फ़र को अपना सम्राट घोषित कर दिया। इसके बाद जगह जगह बग़ावत हुई, वतन परस्त हिन्दुओं और मुसलमानों की कई टोलियां हाथ मे निशाने महावीरी और निशाने मोहम्मदी लिए, ‘हर हर महादेव’ और ‘अल्लाह ओ अकबर’ का नारा लिए हुए फ़िरंगीयों पर टूट पड़े। या तो जाम ए शहादत नसीब हुई या फिर फ़तह, कई जगह जीत हासिल करने के बाद बागियों ने अपनी आज़ाद सरकार की बुनियाद डाली और बाग़ियों ने अपनी सरकार दर्शाने के लिये दो झण्डे निशाने मोहम्मदी और निशाने महावीरी अपने इलाक़े मे लगाये।

1857 की क्रांति दिल्ली होते हुए कानपुर में भी फ़ैल गयी थी। कानपुर के क्रांतिकारी का नेतृत्व नाना साहब के हाथ में था, 4 जून 1857 में क्रांतिकारी की गुप्त बैठक हुई उसमे शमशुद्दीन ख़ां, नाना साहेब, अज़ीमुल्लाह ख़ान, तात्या टोपे, अज़ीज़न सहित कई क्रांतिकारी शामिल हुए। चूँकि कानपुर की पहली लड़ाई में नाना साहेब जीत चुके थे, इसलिए उन्हें विठुर का शासक बना दिया गया।

कुंवर सिंह के क़यादत (नेतृत्त्व) में दानापूर के बाग़ी फ़ौज ने सबसे पहले आरा पर धावा बोल वहां के अंग्रेज़ी ख़ज़ाने पर क़ब्जा कर लिया। जेलख़ाने के क़ैदियों को रिहा कर दिया। अंग्रेज़ी दफ़्तरों को ढाहकर आरा के छोटे से क़िले को घेर लिया। इस तरह 27 जुलाई 1857 को दानापूर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और दीगर साथियों के साथ मिलकर बाबु कुंवर सिंह ने ना सिर्फ़ क़िला बल्कि पूरे आरा शहर पर ही कब्ज़ा कर लिया, और यहां आज़ाद सरकार की बुनियाद डाली। उन्होंने सरकार की निशानी के तौर पर क़िले दो झण्डे निशाने मोहम्मदी व निशाने महावीरी लगाये गये।

अब सवाल ये उठता है के एक सिपाही की बग़वात ने पुरे मुल्क मे इंक़लाब आख़िर कैसे पदा कर दी … ?? ये जानने के लिए आपको क्रांतिदूत अज़ीमउल्लाह ख़ान के बारे मे पढ़ना पड़ेगा!!

अज़ीमउल्लाह ख़ान कौन थे? 1857 की क्रांति मे उनका क्या रोल था? उनका पूरा नाम था अज़ीमउल्लाह ख़ान युसुफ़ज़ई, और उन्हे क्रांतिदूत अज़ीमउल्लाह ख़ान के नाम से भी जाना जाता है। क्रांतिदूत इसलिए क्योंके उन्होने ही 1857 की क्रांति को भारत के चप्पे से ले कर दुसरे मुल्कों तक पहुंचाया।

अज़ीमउल्ला ख़ान का जन्म सन 1820 में कानपूर शहर के समीप पटकापूर में हुआ था। उनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और परिवार ग़रीबी का जीवन व्यतीत कर रहा था। बचपन में ही अंग्रेज़ सैनिकों द्वारा अज़ीमउल्लाह के पिता के साथ दुर्व्यवहार किया गया, जिसका अज़ीमउल्लाह चश्मदीद गवाह और भुक्त भोगी भी थे। उनके पिता को छत से नीचे गिरा दिया और फिर ऊपर से ईंट फेंककर मारा गया, जिसके बाद वो छ: माह बिस्तर पर पड़े रहे और फिर उनका इंतक़ाल भी हो गया। अब अपनी माँ के साथ आठ साल के बच्चे अज़ीमउल्लाह ख़ान बेसहारा होकर बेहद ग़रीबी की ज़िन्दगी जीने को मजबूर हो गये। अब अज़ीमुल्लाह ख़ान के लिए दुसरों के यहाँ जाकर काम करना एक मजबूरी बन गई। उनके एक पड़ोसी ने उन्हे एक अंग्रेज़ अफ़सर हीलर्सडन के घर की सफ़ाई का काम दिलवा दिया। अब अज़ीमुल्लाह ख़ान अंग्रेज़ अफ़सर हीलर्सडन के यहाँ रहने लगे। घर का काम करते हुए उन्होंने हीलर्सडन के बच्चों के साथ अंग्रेज़ी और फ्रेंच ज़ुबान भी सीख ली। इसके बाद हीलर्सडन की मदद से उन्होंने स्कूल में दाख़िला भी ले लिया। स्कूल की पढ़ाई ख़्तम होने के बाद हीलर्सडन की सिफ़ारिश से उसी स्कूल में उन्हें टीचर की नौकरी भी मिल गयी। स्कूल में मौजूद टीचर से ही अज़ीमुल्लाह ख़ाँ उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी और संस्कृत भी सीखने लगे।

इसी के साथ अब वे देश की राजनितिक, आर्थिक तथा धार्मिक, सामाजिक स्थितियों में तथा देश के इतिहास में भी रुचि लेने लगे। उन्होने जी लगा कर पढ़ाई की जिसके बाद अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के नाम के चर्चा पुरे कानपूर में होने लगा। उनकी पहचान एक ऐसे शख़्स के रूप में होने लगी, जो अंग्रेज़ी रंग में रंगा होने के वावजूद अंग्रेज़ी हुकूमत का हिमायती नहीं था, उस ज़माने में किसी हिन्दुस्तानी का अंग्रेज़ी और फ्रेंच ज़ुबान पर उबुर हासिल करना एक बड़ी बात हुआ करती थी।

यही वजह है के अज़ीमुल्लाह ख़ान की यह शोहरत कानपुर के पास रह रहे नाना साहब तक भी पहुँच गई। उन्होंने अज़ीमउल्लाह ख़ाँ को अपने यहाँ बुलाया और अपना दीवान बना दिया। अज़ीमउल्लाह ख़ाँ ने वहाँ रहकर घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और जंगी तरबियत भी सीखी। इसी बीच 1853 मे अंग्रेज़ गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौज़ी की हुकूमत ने नाना साहब की आठ लाख रुपये की सालाना पेंशन बंद कर दी जिसके बाद अज़ीमउल्लाह ख़ान नाना साहब के नुमाईंदे की हैसियत से उनकी पेंशन की अर्ज़ी को लेकर इंग्लैण्ड गये। इंग्लैण्ड में उनकी मुलाक़ात सतारा रियासत के नुमाईंदे रंगोली बापू से हुई। रंगोली बापू सतारा के राजा के राज्य का दावा पेश करने के लिए लंदन गये हुए थे। सतारा के राजा के दावे को ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ के ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर’ ने ख़ारिज कर दिया। अज़ीमुल्लाह ख़ान को भी अपने पेंशन के दावे का अंदाज़ा पहले ही हो गया। अाख़िर में हुआ भी वही।

कहा जाता है की रंगोली बापू के साथ बातचीत में अज़ीमउल्लाह ख़ान ने इन हालातों में अंग्रेज़ी हुकुमत के ख़िलाफ़ हथियारबमद आंदोलन की ज़रुरत को ज़ाहिर किया था। फिर इसी अज़्म के साथ दोनों वापस हिन्दुस्तान लौटने लगे। हिन्दुस्तान पहुँचने से पहले वे लोग यूरोप के देशों में घूमकर वहां के हालात के बारे में पता कर लेना चाहते थे।

इन्ही सब बातों ज़ेहन में रख वह कुस्तुनुतुनिया जा पहुँचे और वहां देखा की क्रीमिया के युद्ध में रूस के मुकाबले इंग्लैंड, तुर्की और फ़्रांस की संयुक्त फ़ौज हार गई है। 1854 में वो क्रीमिया के जंगी मैदान भी गए जहां हारे हुए अंग्रेज़ी सिपाहीयों के लीडरशिप का मुआयना किया, साथ ही रुस और तुर्की के जासुसो से भी तालुक़ात बढ़ाए, अग्रेज़ो के बहादुरी का खोखलापन उनके सामने था, वह सोचने लगे अगर हिन्दुस्तान की देसी रियासते संयुक्त होकर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जंग करें तो अंग्रेज़ों को भगाया जा सकता है, इस घटना ने उनके दिल में इंक़लाब और आशावाद का संदेश दिया। हिन्दुस्तान लौटते समय वो अपने साथ कई फ़्रंच प्रिंटिंग मशीन लेते आए, जिसकी मदद से वो पूरे इलक़े में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पर्चे बटवाने लगे।

अज़ीमउल्लाह ख़ान ने नाना साहब से आपसी विमर्श करने के बाद कई व्यक्तियों को संगठित किया, फिर इन लोगो की मदद से अज़ीमुल्लाह ख़ान जगन्नाथपुरी, पंचवटी, रामेश्वरम, द्वारिका, नासिक, अजमेर, दिल्ली जैसी तमाम मज़हबी स्थानों की यात्रा की, लोगों को अंग्रेज़ो के चाल के बारे में बताया गया, जो लोग अंग्रेज़ो से पहले से नाराज़ थे उन्हे पुरा लेखा जोखा दिया गया, कई बार एैसा हुआ के नाना साहब दरगाहों, मज़ारों और मस्जिदों के चौखट पर जा कर लोगों से बात करते और अज़ीमउल्लाह ख़ान मंदिर, मठ और साधु संतों के बीच जा कर बात करते , इसका बहुत ही अच्छा प्राभाव पड़ा, जहां बिहार के हिन्दु और मुस्लिम राजपुत योद्धा बाबु कुंवर सिंह के साथ खड़े हो गए तो वहीं इल्लाहाबाद के पांडो ने मौलवी लियाक़त अली को अपना लीडर माना, एैसा ही हर जगह देखने को मिला। जैसे भोपाल के सीहोर में वली शाह और महावीर कोठ की क़यादत में बग़ावत का झंडा बुलंद कर “सिपाही बहादुर” के नाम से सरकार तक बना ली गई। ज्ञात रहे के अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ बनी यह पहली समानांतर सरकार थी। इस सरकार में वली शाह, आरिफ़ शाह, महावीर और रमजू लाल जैसे लोग शामिल थे। इन्होंने प्रशासन चलाने के लिए एक कौंसिल की स्थापना की। इसका मुखिया महावीर कोठ हवलदार को बनाया गया। इसलिए यह कौंसिल महावीर कौंसिल के नाम से मशहूर हुई।

उन दिनों रूस व इंग्लैण्ड में युद्ध जारी था, जिसका मक़सद क्रमिया पर क़ब्ज़ा करना था, 1857 में अंग्रेज़ो ने तुर्कों से अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए उस्मानी ख़लीफ़ा से भारतीय मुस्लिमों के लिए ये फ़तवा ले लिया के अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ जो भी जंग लड़ रहा है वो वहाबी है, और इस हिसाब से अंग्रेज़ो ने सुफ़ी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को भी वहाबी घोषित करने की बहुत कोशिश की, अहमदुल्लाह शाह फ़ैज़ाबादी को वहाबी कहा गया , पचास हज़ार का ईनाम रखा गया, ये सब प्रोपेगंडा के तहत किया गया, तब अज़ीमउल्लाह ख़ान ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध रूसियों से मदद लेने का भी प्रयास किया था।

‘भारत माता की जय’

आम तौर पर माना जाता है के भारत देश का नाम भारत नामक जैन मुनि के नाम पर पड़ा है। कई जगह यह भी मान्यता है कि शकुन्तला के बेटे भरत जो बचपन में शेरो के संग खेलकर बड़े हुए, उनके नाम पर देश का नाम भारत पड़ा। यह भी हो सकता है कि राम के भाई भरत के नाम पर भारत नाम पड़ा हो या कृष्ण से 500 साल पहले नाट्यशास्त्र के मशहूर योगी भरत के नाम पर पड़ा हो! जब ये सारे नाम पुल्लिंग हैं तो ये बीच में भारत माता कहां से आ गई?

असल में क्रांतिदूत अज़ीमउल्लाह ख़ान ने “मादर ए वतन हिन्दुस्तान की ज़िन्दाबाद” का नारा दिया था, जिसका मतलब हुआ ‘मां का मुल्क हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद’ और ये पुरा लहजा फ़ारसी का है जिसमें उर्दू और हिन्दी के लफ़्ज़ को साथ जोड़ा गया। बहरहाल, ‘हर हर महादेव’ और ‘अल्लाह ओ अकबर’ के नारों के साथ “मादर ए वतन हिन्दुस्तान की जय” का नारा भी इंक़लाबियों के मुंह पर आ गया, जिसे तमाम मज़हब के इंक़लाबी लगाया करते थे, बाद में यही नारा कुछ साल बाद 19वीं में हिन्दी उर्दु झगड़े की भेंट चढ़ गया, हिन्दी हिन्दुओं की ज़बान हो गई और उर्दु मुसलमान की, जिसके बाद बेरादरान ए वतन हिन्दु ‘भारत माता की जय’ कहने लगे और मुसलमान ‘हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद’ कहने लगे, बाद मे इन दोनो नारों की जगह बंकिन चंद चट्रजी के ‘वंदे मातरम’ और हसरत मोहानी के ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ ने ले ली, हिन्दु मुस्लिम के मज़हबी एकता के नाम पर शुरु हुआ 1857 का आंदोलन अपने 50 साल होते होते ही हिन्दु मुस्लिम दुशमनी का एक रुप ले लिया वो भी ज़बान और नारों के रुप में।

हिन्दु मुस्लिम दुशमनी को दूर कर एक बार फिर से अंग्रेज़ो पर टूट पड़ने का प्लान नेता जी सुभाष चंद्रा बोस औऱ ‘जय हिन्द’ का नारा देने वाले आबिद हसन साफ़रानी ने बनाया पर बहुत हद तक नाकामयाब रहे, फिर मुल्क बटा, लाहौर पाकिस्तान में चला गया और साथ ही “सरे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा” लिखने वाले अल्लामा इक़बाल और उनका रौज़ा भी।

क्रांतिदूत अज़ीमउल्लाह ख़ान युसुफ़ज़ई 1859 तक हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए ख़ाक छानते रहे और 39 साल की उम्र में उनका इंतक़ाल हो गया।

हिन्दुस्तान के लिए एक गीत रचा था मौलवी लियाक़त अली ने जिसे इस अज़ीम योद्धा अज़ीमुल्लाह ख़ान ने अपने रिसाले में शाय किसा था। उसी गीत के साथ अज़ीमउल्लाह ख़ान को ख़िराज ए अक़ीदत <3 हम हैं इसके मालिक हिन्दुस्तान हमारा, पाक वतन है क़ौम का जन्नत से भी न्यारा। ये है हमारी मिल्कियत, हिन्दुस्तान हमारा इनकी रूहानियत से रोशन है जग सारा। कितना क़दीम कितना नईम, सब दुनिया से प्यारा, करती है ज़रख़ेज़ जिसे गंगो-जमुन की धारा। ऊपर बर्फ़ीला पर्वत पहरेदार हमारा, नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा। इसकी खानें उगल रही हैं, सोना, हीरा, पारा, इसकी शानो-शौकत का दुनिया में जयकारा। आया फ़िरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा, लूटा दोनों हाथ से, प्यारा वतन हमारा। आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा, तोड़ो गुलामी की जंज़ीरें बरसाओ अंगारा। हिन्दू-मुसलमां, सिख हमारा भाई-भाई प्यारा, यह है आज़ादी का झंडा, इसे सलाम हमारा। मोहम्मद उमर अशरफ

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here