पढ़ना भी भला कौन चाहता है। कहते हैं अगर आपने माटी की ख़िदमत की है, तो एक न एक रोज़ उसकी महक दुनिया महसूस करेगी। मेरे पास लिखने को हज़ार पन्ने हैं, लाखो शब्द हैं मगर मैं उनकी शख्सियत पर क्या क्या लिखूँ।

साहित्य अकादमी सम्मान से नवाज़ी,दो बार राज्य सभा सांसद, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और सबसे बढ़कर बंटवारे में शरणार्थी कैम्प में जीजान से ख़िदमत करने वाली बेग़म अनीस क़िदवई।

शायद वह इकलौती औरत जिसने कैम्प में लाशो को नहलाया,कफ़न दफ़्न किया,यहाँ तक कब्रें भी खोदी,तब जाकर बंटवारे से उपजा ज़ख्म हम पाट पाए थे। हज़ारों लडकियां जो बेच दी गईं, जो उठा ले जाई गईं, जिन्हें भीड़ ने काफिलों से लूटकर छीन लिया, अपने घरों में बांध लिया, चुन चुन कर एक-एक लड़की को वापिस उसके परिवार में पहुँचाने वाली बेग़म अनीस क़िदवई।

आज नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय के एकदा में भी बेग़म अनीस क़िदवई की ज़िन्दगी का एक लम्हा लिखा है। आज उनकी पुण्यतिथि है। खोजिए,इन्हें पढ़िए,इनके दिलों को हौसले को महसूस कीजिये। यह जो सत्तर साल हम मिल बाँटकर साथ वक़्त गुज़ार लिए,उसकी बुनियाद हैं बेग़म अनीस क़िदवई।

“आज़ादी की छाँव में” उनकी लिखी किताब पढ़िए और रोइये। देखिये ज़मीन को मज़हब के नाम से फाड़ने पर कितने दिल टूटे थे। इस सबसे इतर उस वक़्त के हालात देखिये,वह कौन लोग थे जो तब भी भीड़ बनकर डरा रहे थे। सैकड़ो साल से साथ रह रहे अपने भाइयों को खींचकर गाँव से बाहर कर रहे थे और कितनी हो बेंटियों को गले में रस्सी डालकर,बिना कपड़ों के घर में बाँधे रखे थे। यह सारे दर्द,यह सारी नाइंसाफी,यह सारे ज़ख्म को बेग़म अनीस क़िदवई और मृदुला साराभाई ने साथ-साथ भरकर हमारे देश की बुनियाद रखी है। आज,हाँ आज तो उन्हें याद ही करलें… हम तो रो रोकर पलट कर देखते हैं, कि काश इनके रत्ती भर सेवा और समर्पण आ जाए,तो इस माटी की ख़िदमत में मर मिटूँ।

हाफिज़ किदवई

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