“हाथ को आया पर मुह न लगा।” निर्देशक शाद अली और पंजाबी सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ के अभिनय से सजी फ़िल्म “सूरमा” को देखकर कुछ ऐसा ही महसूस होता है। निर्देशक ने कोशिश तो बहुत की कि अब दर्शक जागे, अब वो चहक जाए, मगर ऐसा हो न सका।

फ़िल्म की कहानी संदीप सिंह(दिलजीत दोसांझ) नाम के एक हॉकी खिलाड़ी पर केंद्रित है। संदीप और उसका बड़ा भाई बिक्रम(अंगद बेदी) बचपन से हॉकी खेलते हैं लेकिन संदीप कोच की डांट और मार से डरकर प्रैक्टिस छोड़ देता है। नौ साल बाद उसकी ज़िंदगी करवट लेती है और वो एक महिला हॉकी खिलाड़ी हरप्रीत (तापसी पन्नू) के कहने पर दोबारा हॉकी खेलना शुरू करता है। फ़िर कहानी वही मोड़ लेती है, प्यार, इश्क़ के चक्कर में लड़का दुनिया फतेह कर लेता है और आख़िरकार सबके सपने साकार होते हैं। सब कुछ सही चल ही रहा होता है कि ज़िन्दगी में ट्रेजेडी आती है। हॉकी वर्ल्ड कप खेलने जा रहे संदीप के साथ शताब्दी ट्रेन में एक हादसा हो जाता है जिसमें उसकी पीठ में गोली लगती है और उसकी कमर के नीचे का हिस्सा लक़वा मार जाता है। ये दौर उसके लिए काफी मुश्किल भरा था। साल भर तक वो बिस्तर और व्हील चेयर पर रहता है। आख़िरकार वो अपनी इतनी बड़ी कमज़ोरी से उबरता है। हॉकी फेडरेशन और सही इलाज की मदद से वो पूरी तरह ठीक होकर अपने पैरों पर खड़ा होता है और ग्राउंड में वैसी ही रौबदार वापसी करता है।

दिलजीत दोसांझ एक हॉकी खिलाड़ी के रूप में फिट नज़र आ रहे हैं और उन्होंने अपने रोल पर खासी मेहनत की है जो हर फ्रेम में दिखती है। चाहे वो एक नौउमरे लड़के की मासूमियत हो या फिर एक परिपक्व खिलाड़ी की सहजता, हर चीज़ उनके चेहरे से ही बयान हो गयी है। वहीं पहली बार किसी फिल्म में स्पोर्ट्स अथॉरिटीज़ को एक सकारात्मक रोल में दिखाया गया है जो काफी सुकूनदेह है। अंगद बेदी दिलजीत के बड़े भाई के रोल में जंच रहे हैं और उन्होंने अपने हिस्से का काम इमानदारी से किया है। वहीं सतीश कौशिक, कुलभूषण खरबंदा, और विजय राज भी अपने किरदारों में फिट हैं। यहाँ पर खासतौर तापसी पन्नू का ज़िक्र करना चाहूंगी। तापसी के हिस्से फिल्म में कुछ भी नही आया है। यहाँ तक कि एक यादगार सीन भी नहीं, जबकि वो संदीप की प्रेमिका के रूप में दिखायी गयी हैं। तापसी के किरदार के साथ शाद अली ने बहुत नाइंसाफी की है। उनसे ज़्यादा महत्वपूर्ण किरदार और डायलॉग तो विजय राज के पास थे जिनके बिहारी तेवर पर हर बार वाह निकल रही थी। तापसी का किरदार कब शुरू होता है, कब फिल्म में आ जाता है, कब गायब होता है, क्या सोचता है या वो किस तरह की लड़की है और अंत में उसका क्या होता है ये पता ही नही चल पाता। यहाँ तक कि तापसी के हिस्से ढंग की वेशभूषा भी नही है।

वहीं अगर फिल्म की कहानी सुनकर आपको रत्ती भर भी ऐसा महसूस हुआ कि ये कहानी भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रहे संदीप सिंह पर आधारित है तो आप पूरी तरह ग़लत हैं। आजकल के निर्देशकों और लेखकों की कमी यही है कि वो बायोपिक की नाम पर एक मसालेदार कमर्शियल फ़िल्म परोसते हैं जिसमें एक हीरो, एक हीरोइन, एक विलेन और एक सुखद अंत की ज़रूरत होती ही होती है। सूरमा यहीं मार खा जाती है। संदीप सिंह की ज़िंदगी को इस हद तक तोड़ा मरोड़ा गया है कि फ़िल्म फैक्ट्स और सच्चाई पर केंद्रित नही बल्कि इंस्पायर्ड लगती है।

संदीप सिंह ने निजी जिंदगी में इतने रिकार्ड्स और खिताब अपने नाम किये हैं कि अगर सिर्फ उनपर ही फ़िल्म बनाई जाती तो भी सुपर हिट होती। मगर शाद अली ने अपनी लेखनी और निर्देशन के ज़रिए बनी बनायी खानी को जैसे ख़त्म ही कर दिया।

फिल्म का संगीत भी बहुत लम्बे समय याद रहने लायक नही है। शंकर महादेवन की आवाज़ भी आपको शब्दों से प्यार नही करवा पाएगी। हाँ कुछ दिनों तक ये गाने पार्टीज़ में तो सुनाई देंगे लेकिन उसके आगे इनका कोई महत्त्व नही।

फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी स्प्रिट है। आप एक बार भी स्क्रीन पर दिख रहे खिलाड़ी से जुड़ाव महसूस नही करते। जबकि एक खिलाड़ी की ज़िंदगी पर बनी बायोपिक के नाते इसमें कई दिल धड़का देने वाले मौके हो सकते थे। मगर ऐसा नही हुआ। फिल्म की शुरुआत से अंत तक हम आराम से बैठे रहे, कोई कौतुहुल या कोई जिज्ञासा नही उभरी। यहाँ तक कि फिल्म का क्लाइमेक्स हो गया और हमें अंदाजा भी नही हुआ। अचानक से जब संदीप सिंह के भारत रत्न की असली फुटेज दिखायी जाने लगी तो पता चला। यूँ लगा फिल्म को मानो बीच में छोड़ दिया हो।
मैं इसे पांच में से ढाई स्टार दूंगी और आपको फ़ोन या लैपटॉप पर देखने की सलाह दूंगी। वो भी तब जब आपके पास कुछ भी और देखने का चारा ना हो।

महविश रज़वी

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