आप कोई भी धार्मिक या सामाजिक किताब उठाकर देख लीजीये, हर किताब में औरत को बहुत ही सम्मानजनक औहदा देने की बात की गयी है. हर किताब में बताया गया है कि औरत इस सृष्टि की निर्माता है. एक बेहतर मनुष्य या पुरुष होने के लिए हमें अपने आस-पास की हर स्त्री का सम्मान करना चाहिए. किंतु आज की सदी में ये सभी शिक्षा किसी कूड़े के ढेर में दबी पड़ी हैं. उस कूड़े के ढेर के नीचे जिसमें एक कन्या भ्रूण, घरेलू हिंसा में जलायी गयी स्त्री, सामूहिक बलात्कार का दर्द न झेल सकी लड़की और बेटे की बेरुखी से छत से फ़ेंक दी गयी स्त्री की लाश सबसे ऊपर पड़ी है.

ताज़ा मामला कोलकाता जैसे आधुनिक शहर का है. यहाँ पर ‘मिसिंग आर्ट प्रोजेक्ट’ संस्था के लोगों ने लड़कियों के खिलाफ हो रहे अपराधों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए ‘मिसिंग गर्ल’ नाम का कैंपेन शुरू किया है. इस कैंपेन में उन्होंने एक म्यूरल यानी दीवार पर बनाए गए एक चित्र द्वारा लोगों को समझाने की कोशिश की. इस तस्वीर के ज़रिये उन्होंने देश में सेक्स व्यापार के लिए लड़कियों की तस्करी के खतरे को बताते हुए दीवारों पर एक लड़की के काले सिल्हूटों को पेंट किया था, जिससे लोगों में जागरुकता फैले. तस्वीर के साथ उन्होंने एक हेल्पलाइन नंबर भी पेंट किया था. लेकिन एक शोषित समाज से लड़कियों की सुरक्षा की अपील कर रही इस कलाकृति को लोगों ने अपनी गंदी सोच का आईना बना दिया. किसी ने उस तस्वीर पर चॉक से स्तन और योनी भी बना दिए. काले रंग की कलाकृति पर सफ़ेद चॉक से रेखांकित किये गए स्त्री अंग सबसे पहले ध्यान आकर्षित करते हैं.

इस कैंपेन के लिए काम करने वाली एक कार्यकर्ता ने लोगों के इस बर्ताव पर गुस्सा जताया है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा “अगर हम एक स्टेंसिल को ‘यौन हमले’ से नहीं बचा सकते तो हम किसी लड़की को कैसे बचा सकते हैं. @missingirls देह व्यापार और मज़दूरी के लिए लड़कियों की तस्करी के बारे में जागरुकता फैलाने की तमाम कोशिशें कर रही हैं. हम महिला अधिकारों की पुस्तकें छाप रहे हैं और यहां लोग अपने मज़े के लिए एक स्टेंसिल पर ब्रेस्ट बना रहे हैं. ये तस्वीर मेरे ही ऑफिस के पास की है. हमने एक औरत को कितना नीचे गिरा दिया है कि उसकी हैसियत सिर्फ दो ब्रैस्ट और एक वेजाइना तक सीमित हो गयी है.”

एक कलाकृति के साथ हुई इस छेड़छाड़ पर आपको असहज होने की ज़रुरत है. ज़रुरत है इस मुद्दे को गहराई से समझने की. ऐसे ही छोटे-छोटे कामों से लोगों का मनोबल बढ़ता है और बाद में यही समस्या विकराल रूप ले लेती है.

हम अक्सर पब्लिक ट्रांसपोर्ट्स की टॉयलेट्स में लड़कियों के लिए अभद्र भाषा में लिखी गालियाँ या नोट्स देखते हैं. हमे हर उस शब्द को मिटा देना चाहिए जो हमारी जाति का शोषण कर रहा हो. शब्द मिटेंगे तभी धीरे-धीरे इस तरह की सोच का सफाया होगा. एक बात ध्यान रखिये, बीमार मानसिकता का मनुष्य किसी दूसरे गृह पर नही बल्कि आपके और हमारे घरों में ही रहता है. हर स्त्री किसी दूसरी स्त्री के संरक्षक पुरुष का शिकार है.

महविश रज़वी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here