पिछले हिस्से में लिखा था किस तरह से सयैद साहब ने पंजतार को अपना मुक़ाम बनाया और सारे प्रोग्राम वहीं से चलाए. 1829ई के आखिर में पेशावर फतह कर लिया जिससे कि कई सरदार खिलाफ हो गए, जिसमें राजा रणजीत सिंह और उसके मातहत सरदार शामिल थे और क़त्ले आम में करीब 4000 मुजाहिद शहीद हो गए.

इस दर्दनाक हादसे ने सयैद साहब को झंझोड़ के रख दिया. आप को यकीन हो गया कि इन स्वार्थी सरदारों पर अब किसी तरह का भरोसा नही किया जा सकता. इसलिए आप ने पंजतार को छोड़कर “सिंध” को अपना मरकज़ बनाने का फैसला लिया. आप सरहद से रवाना हो गए और साथियों को भी इजाज़त दे दी कि जो जाना चाहे चला जाए मगर किसी ने भी सयैद साहब की जुदाई को गवारा नही किया. पेशावर की फतह के 16 महीने बाद आप पंजतार से रवाना हुए और आप की अस्थाई हुकूमत 4 साल कायम रही.

सयैद साहब के सरहद से रवाना होते ही पेशावर और समह पर सिख सेना से कब्ज़ा कर लिया. दूसरी तरफ सेना सयैद साहब का रास्ता रोकने लगी लेकिन कामयाब न हो सकी, इस मुबारक काफ़िले ने बालाकोट पहुंचकर पहाड़ो के बीच मे एक महफ़ूज़ जगह पर पड़ाव डाल लिया.

राजा रणजीत सिंह का बेटा शेर सिंह बालाकोट से कुछ मील के फासले पर बीस हज़ार सैनिकों के साथ इस कोशिश में था कि सयैद साहब की ताकत तो बिल्कुल खत्म करदे ताकि आगे चलकर सिख सरदार को कोई खतरा बाकी न रहे. उस ने कुछ गद्दारों से साठ गांठ करके रातों रात रास्ते की सारी रुकावटों को पार किया और सुबह को अचानक मुजाहिदीन की जमाअत पर भरपूर हमला कर दिया. सयैद साहब और मौलाना इस्माइल शहीद ने अपने साथियों के साथ बड़ी दिलेरी से मुकाबला किया लेकिन दुश्मन की भारी तादात और पहले से कोई तैयारी न होने की वजह से कोई कोशिश कामयाब न हो सकी और 17 मई 1831ई (24 ज़िल्हिज्जा 1246 हिजरी) को जुमे के मुबारक दिन में इस मुक़द्दस जमाअत के 300 ज़ियालों ने अपने मार्ग दर्शक “हज़रत सयैद अहमद शहीद” और “शाह इस्माइल शहीद” की क़यादत में शहादत को गले लगाकर अमर हो गए और दीन पर जान देने वालों में सुनहरे हर्फ़ों में अपना नाम रोशन कर गए.

सिख सेना में शरीक मुसलमानों ने जंग खत्म होने के बाद सब शहीदों को सम्मान के साथ जनाज़े की नमाज़ पढ़कर उसी मैदान में दफ्न कर दिया. सयैद साहब के बाद कुछ खु-ल-फ़ा ने इस तहरीक को दोबारा संगठित किया और थोड़े-थोड़े वक़्त के बाद जिहाद का झंडा बुलंद करते रहे.

जारी है…
इमरान

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