पिछले हिस्से में लिखा कि किस तरह सयैद साहब की वफात के बाद अमारत सयैद मौलाना नसीरुद्दीन साहब के पास आई और इधर दिल्ली में कमान मौलाना इसहाक साहब के पास थी जिन्होंने माली मदद के साथ साथ फौजी भर्तियां भी की. नसीरुद्दीन साहब 1839 में अस्थाना पहुंचे और करीब 1840 के आखिर तक उनका भी इंतेक़ाल हो गया.

मौलाना सयैद नसीरुद्दीन साहब की वफात के बाद दिल्ली में हालात खराब होने लगे थे इसलिए हज़रत शाह मौलाना मोहम्मद इसहाक साहब अपने भाई हज़रत शाह मोहम्मद याक़ूब और परिवार के दूसरे लोगो के साथ 1844 मे मक्का मुकर्रमा हिजरत कर गए. आप के बाद दिल्ली में आपके उत्तराधिकारी हज़रत शाह अब्दुल गनी हुए जिन के शागिर्द खास तौर पर मौलाना मोहम्मद क़ासिम साहब नानौतवी, मौलाना रशीद गंगोही ने 1875 की जंग ए आज़ादी के आंदोलन में विशेष योगदान दिया. 1857 के हंगामे के बाद हज़रत शाह अब्दुल गनी भी मक्का मुकर्रमा हिजरत कर गए.

हज़रत अहमद रशीद से ख़ुसूसी ताल्लुक़ रखने वाले हज़रात ने देश के दूसरे क्षेत्रों में आपकी तहरीक को ज़िंदा रखा चुनाँचे सादिकपुर (पटना) के रहने वाले हज़रत मौक़ान विलायत अली साहब जो सयैद साहब से खास ताल्लुक़ रखने वालों में से थे उन्होंने इस आंदोलन के शुरू के दिनों में ही इसकी एक ब्रांच सादिकपुर में कायम कर दी थी और सरहद के सफर में भी आप और आपके भाई मौलाना इनायत अली सयैद साहब के साथ रहे मगर आप फिर सयैद साहब के कहने पर हैदराबाद चले गए और आपके भाई मौलाना इनायत अली को सयैद साहब ने बंगाल भेज दिया.

मौलाना इनायत अली साहब की गतिविधियां हैदराबाद के अंग्रेज़ो से ताल्लुक रखने वाले हाकिमों को पसंद न आई इसलिए आप वहां से बम्बई आ गए. अभी आप बम्बई में काम कर ही रहे थे कि बालाकोट का हादसा पेश आ गया तो आप बुरहानपुर, जबलपुर, नरसिंहपुर, वगेरह इलाकों में वअज़-ओ-तबलीग़ की खिदमत को अंजाम देते हुए दो साल में अपनी ब्रांच पटना पहुंचे और बिखरे हुए निज़ाम को संवारने में लग गए.

तरीका वही था जो सयैद साहब ने निश्चित कर दिया था यानी आम मजमों में दीनी तकरीरें की जाती जिन में खास तौर पर जिहाद का मज़मून बयान किया जाता और छोटी छोटी इस्लाही किताबें छपवा कर तकसीम की जाती, जगह जगह क़ुरआन और हदीस के दर्स का सिलसिला जारी किया जाता. पटना मरकज़ के असली ज़िम्मेदार तो मौलाना विलायत अली साहब ही थे जो उस आंदोलन की पूरी निगरानी फरमाते और अलग अलग जगहों पर काम करने वाले मुजाहिदीन को हिदायत जारी फरफातें. इसी तरह इस मरकज़ का कांटेक्ट मौलाना इनायत अली साहव से भी था जो बंगाल में काम कर रहे थे और उन्होंने वहां मुजाहिदीन की बहुत बड़ी जमाअत तैयार कर दी थी. उस जमाअत ने निसार अली उर्फ टीटू मियां के नेतृत्व में 1831ई में बगावत का झंडा भी बुलंद किया था. 1846ई तक इस जमाअत की तादात 80,000 तक पहुंच गई थी इसी तरह मौलाना मोहम्मद अली रामपुरी का भी पटना के मरकज़ से संपर्क था जो मद्रास के इलाके में काम करते थे. पटना के ही मरकज़ में एक खुफिया इमारत बनाई गई थी जिस में मुजाहिदीन ठहरते और आगे के प्रोग्राम बनाते.

10 साल तक मौलाना विलायत अली साहब बंगाल, बिहार और बम्बई में काम करते रहे, इस दरमियान आपने मुख्तलिफ इलाकों का दौरा भी किया और हज के सफर पर भी तशरीफ़ ले गए. 1845 में बालाकोट के सरदार ज़ामिन खान ने आपके पास पैगाम भेजा के सिख राजा गुलाब सिंह के मुकाबले के लिए मेरी मदद की जाए तो मौलाना विलायत अली साहब ने फ़ौरी तौर पर 500 मुजाहिदों की एक जमाअत मौलाना इनायत अली साहब के नेतृत्व में बालाकोट भेज दी और कुछ दिनों बाद 9 अक्टूबर 1846ई (17 शव्वाल 1262 हिजरी) को जुमे के दिन खुद बालाकोट पहुंचकर फ़ौज की ज़िम्मेदारी अपने हाथ मे ले ली. इस सफर में मौलाना फय्याज अली साहब, मौलाना याहया साहब, मौलाना अकबर अली साहब जो पटना के रईस मौलाना इलाही बक्श के बेटे थे सफर में शामिल थे.

मौलाना विलायत अली के सरहद आ जाने के बाद सादिकपुर (पटना) ब्रांच की ज़िम्मेदारी मौलाना के छोटे भाई मौलाना फरहत हुसैन के सुपुर्द हुई जिसे वो 1858ई तक बड़े अच्छे से निभाते रहे.

…जारी है
इमरान

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