धड़क मूवी रिव्यू: कॉपी हुआ तो क्या हुआ, मेहनत तो बिल्कुल नई है, अपनी है!

भारत में आधी से ज़्यादा प्रेम कहानियाँ इसलिये शुरू होती हैं क्योंकि माँ-बाप कच्ची उम्र के शुरुआती आकर्षण को प्रेम समझ लेते हैं। जिसके बाद लड़के और लड़की दोनों के ऊपर कई बंदिशें लगा दी जाती हैं और उन बंदिशों का अंत होता है बग़ावत। वो बग़ावत प्रेम करके दिखाई जाती है। उस ही इंसान से प्रेम करके अपने बड़े होने, अपने समझदार होने का सबूत दिया जाता है जिससे प्रेम करने के लिए पाबंदी लगा दी जाती है।
मराठी फिल्म “सैराट” के रीमेक के रूप में बनी “धड़क”, जिसका स्क्रीनप्ले और निर्देशन शशांक खैतान ने किया है। नागराज मंजुले की कहानी के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं की गयी है, मगर धर्मा प्रोडक्शन्स की फ़िल्म होने के नाते इसका ट्रीटमेंट बदल दिया गया है।

फ़िल्म शुरू होती है मधुकर(ईशान खट्टर) और पार्थवी(जान्हवी कपूर) के एक मेले में मिलने से। मधुकर उस मेले में एक प्रतियोगिता में हिस्सा लेने आया होता है जिसे वो जीत भी जाता है और पार्थवी वहां पर स्थानीय नेता और अपने पिता राणा जी(आशुतोष राणा) के साथ मुख्य अतिथि बनकर आयी होती है। दोनों के बीच में टीनएज वाला आकर्षण होता है। धीरे-धीरे मिलना जुलना शुरू होता है और आखिरकार बात घरवालों तक पहुंचती है, जिसके बाद सबसे बुरे अंजाम के बारे में सोचा जाता है। लेकिन ऐन मौके पर पार्थवी किसी तरह मधुकर को लेकर वहां से भाग जाती है और दोनों कोलकाता पहुंचते हैं। आगे की कहानी के लिए फ़िल्म देखिये।

सबसे पहली बात ये कि धड़क, सैराट की रीमेक है इसलिये इस फ़िल्म पर प्रेशर कुछ ज़्यादा था। निर्देशक, कहानी, अभिनेताओं और यहाँ तक कि हर सीन की तुलना हो रही है। किंतु ऐसा करना नाइंसाफी है। इस मामले में धड़क काफी हद तक सफल भी हुई है। रीमेक के नाम पर सीन दर सीन और हर संवाद को कॉपी नहीं किया गया है। फ़िल्म में बहुत कुछ अपना है। अच्छी लोकेशन्स और बड़े प्रोडक्शन हाउस का सही इस्तेमाल किया गया है।

फ़िल्म की दिक्कत है इसका फूंक-फूंक कर क़दम रखना। ज़्यादा ही फूंकने के चक्कर में फ़िल्म सही से क़दम नहीं रख पायी। किसी भी चीज़ को गहराई तक नहीं छुआ गया। चाहे वो प्रेम हो या त्रासदी। जैसे हर चीज़ का इंट्रो देकर छोड़ दिया गया हो। मधुकर और पार्थवी के बीच में प्रेम शुरू भी नहीं हो पाता कि लड़ाई हो जाती है और लड़ाई ख़त्म भी नहीं हो पाती कि बच्चा हो जाता है। यहाँ तक कि जिस ऊंची और नीची जाति के नाम पर सारा ख़ून खराबा है, जिस जात से इतनी परेशानी है,उन दोनों ही जातों का नाम नहीं लिया गया है। एक हिंट भी नहीं। शायद यहाँ कहना ग़लत नहीं होगा कि कोई भी शशांक, नागराज थोड़ी बन सकता है। फ़िल्म की जो भी कमी है वो शशांक के ज़िम्मे है। क्योंकि उन्हें कहानी को अपनी नज़र से दिखाना था।
हालांकि उन्होंने एक प्रिडिक्टेबल अंत हुए भी उसमें नयापन लाने की कोशिश की है, जिससे भविष्य में उनसे ज़्यादा उम्मीद की जा सकती है।

ईशान खट्टर की ये दूसरी फिल्म है और जान्हवी की पहली। ईशान पूरी तैयारी के साथ आये हैं। उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म से चर्चा बटोरी और इस फ़िल्म से वो यादगार हो जाएंगे। उन्हें मालूम है कि कब क्या करना है। दूसरी तरफ जान्हवी कपूर हैं जिन्हें असल जिंदगी में ठीक से हिंदी बोलना भी नहीं आती, मगर फ़िल्म में आपको इस बात की भनक भी नहीं लगेगी। पहली फ़िल्म होने के नाते उन्होंने ठीक काम किया है। अगर ढंग से मेहनत की तो वो आगे जाकर सफल भी होंगी। उन्हें अभी गुस्सा करना नहीं आता, अभी मज़ाक उड़ाना नहीं आता, मगर रोना और दुखी होना बखूबी आता है। वो बला की खूबसूरत हैं इस बात को नकारा नहीं जा सकता। जब भी स्क्रीन पर रहती हैं, नज़र उनपर ही रहती है। आशुतोष राणा का अभिनय उनकी निगाहों का पर्यायी हो गया है। फ़िल्म में वो मुख्य विलन हैं पर उन्हें बहुत कम स्क्रीन स्पेस मिली है। उनका किरदार कोई और भी कर लेता तो फ़र्क़ नहीं पड़ता।

धड़क देख लीजिए। एक बार आराम से देखी जा सकती है क्योंकि सिर्फ कहानी दूसरों से ली है मगर मेहनत सौ टका खरी है। फ़िर जब आप शशांक की हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया और बद्री की दुल्हनिया जैसी फ़िल्म को हिट करा सकते हैं तो ये तो तब भी “धड़क” है। उन सबसे काफी अच्छी है।

महविश रज़वी

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