रिहाई मंच द्वारा जारी किया गया पोस्टर

रिहाई मंच ने अपील जारी कर 5 मार्च के भारत बंद का किया समर्थन. सवर्ण आरक्षण, 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ, आदिवासी जनता के हक-हुक़ूक़, निजी क्षेत्रों में आरक्षण, न्याय पालिका में आरक्षण, कॉलेजियम सिस्टम को ख़त्म करने, जाति आधारित जन गणना करके 100% आरक्षण लागू करने, 2 अप्रैल 2018 को हुए भारत बंद के दौरान जेलों में बंद लोगो को रिहा करने और मृतकों के परिवार को मुआवजा देने जैसे सवालों से कोई समझौता नहीं हो सकता. वंचित समाज के अस्तित्व ही नहीं संविधान, सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा पर हमला है जिसे बर्दास्त नहीं किया जाएगा.

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि संसद ही नहीं न्याय पालिका तक संविधान से परे जाकर जो फैसले ले रही हैं उसने लोकतंत्र को हर स्तर पर कमजोर करने का प्रयास किया है. 2 अप्रैल 2018 को हुए भारत बंद के बाद आज भी दलित समाज के लोगों को मुज़फ्फरनगर में रासुका लगाकर जेल में सड़ाया जा रहा है. उपकार बावरा, विकास मेडियन और अर्जुन जहां जेल में बंद हैं वहीं अमरेश की हत्या के आरोप में दलित समाज के ही व्यक्ति को आरोपी बनाया गया. जबकि अमरेश के पिता सुरेश कुमार कह चुके हैं कि उनके बेटे की हत्या पुलिस ने की और उन पर दबाव बनाया गया कि वो मुस्लिम का नाम ले लें तो उन्हें मुआवजा दिया जाएगा. इस मामले की जांच को लेकर आज भी वो लड़ रहे हैं. आगामी आंदोलन में 2 अप्रैल 2018 भारत बंद के लोगों की रिहाई, मुकदमा वापसी और उन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जिन्होंने हत्या की.

रिहाई मंच नेता शाहरुख अहमद ने 28 फरवरी को उप निरीक्षक सीधी भर्ती-2016 के आए परिणाम की बात करते हुए कहा की एक तरफ ब्राह्मणवादी लोग संविधान में मिले दलित ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण की समीक्षा की बात करते हैं पर प्रतिनिधित्व देने की बात पर उनके द्वारा बनाये गए और चलाये जा रहे संस्थानों में पहुचने से रोकने की भरपूर कोशिश की जाति हैं. उप निरीक्षक सीधी भर्ती-2016 में आरक्षित वर्ग के 822 पदों का खाली रह जाना दर्शाता है की जान बूझ कर इनको नहीं भरा गया हैं. डॉ. अम्बेडकर ने भी दलितों के लिए विशेष थानों की मांग की थी और स्टडीज भी बताती है की आज भी दलितों की एफआईआर तक आसानी से नहीं लिखी जाती है. 5 मार्च को होने वाले भारत बंद का समर्थन करते हुए अमन और इंसाफ पसंद अवाम से भी समर्थन की अपील की है. उन्होंने कहा कि यह दौर सामाजिक न्याय की हत्या का दौर है. संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर इस देश के दलित, वंचित शोषित समाज को बेरोजगारी और गुलामी कि तरफ धकेला जा रहा है. उन्होंने जारी अपील में कहा की अब हक – हुकूक की लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाएगी.

रिहाई मंच नेता रॉबिन वर्मा ने जारी अपील में कहा की 13 प्वाइंट रोस्टर के बाद प्रदेश स्तर पर विश्वविद्यालयों में आई भर्ती चाहे वो काशी विद्यापीठ हो या जननायक चन्द्रशेखर यूनिवर्सिटी का विज्ञापन साफ़ कर देता है की दलित ओबीसी का प्रतिनिध्तिव उच्च शिक्षण संस्थानों में लगभग-लगभग खत्म ही हो गया है. जहाँ जननायक चन्द्रशेखर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के 40 पदों में से 30 पद अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षित कर ओबीसी के लिए 10 सीटे और एससी के लिए एक भी पद नहीं है वहींएसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के लिए भी एक भी पद नहीं हैं जबकि अनारक्षित वर्ग के लिए क्रमशः 20 और 10 पद हैं. आरटीआई के माध्यम से ये भी सामने आया है की सरकारी पैसों से चलने वाले देश के आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रीमियर संस्थानों में भी ओबीसी और एससी का प्रतिनिध्त्व ना के बराबर हैं. एक तो पहले से ही संविधान में मिले 49.50% आरक्षण को पूरी तरह लागू नहीं किया गया.13 प्वाइंट रोस्टर पूरी तरह से ओबीसी और एससी का प्रतिनिधित्व खत्म करने का षड़यंत्र हैं. उन्होंने बताया की सरकारी उपक्रम पॉवर ग्रिड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड के भर्ती विज्ञापन में परीक्षा शुल्क दस लाख कमाने वाले आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके के लिए शून्य रखा गया हैं, वही ओबीसी के लिए 400 रुपए हैं.

द्वारा जारी
रॉबिन वर्मा
रिहाई मंच

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