वो एक हिंदुस्तानी शहज़ादी थी, टीपू सुल्तान के मैसूर गद्दी की वंशज। एक रिफ्यूजी जिसे अपना घर छोड़ कर भागना पड़ा था। एक सिक्रेट एजेंट, खूफिया जानकारी निकालने में एक्सपर्ट और बेखौफ सैनिक। लेकिन इन सब से परे वो हिंदुस्तान की सबसे बहादुर बेटी थी।
उसका नाम नूर इनायत खान था और हिटलर की सेना ने उसे मार दिया क्योंकि वो उसके शासन की जड़े हिला देने वाली जासूस थी।
मास्को के एक सूफी संगीतकार परिवार में पैदा हुई नूर टीपू सुल्तान की गद्दी की शहज़ादी थी। दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर ने जब रूस पर कब्ज़ा कर लिया तब नूर का परिवार पेरिस चला गया। इस दौरान हिटलर की सेना की बेरहमी और यहूदियों पर हो रहे अत्याचार को नूर ने करीब से देखा और इस अन्याय के खिलाफ लड़ने का संकल्प लिया।
इसके बाद उन्होंने लंदन का वुमेंस ऑक्साइलारी एयर फोर्स (WAAF) से जुड़ गई। अपनें पतले-दुबले कद काठी और शर्मीले स्वभाव की वजह से किसी को यकीन नही हुआ की ये लड़की जासूस बन सकती है, लेकिन नूर ने ये ट्रेनिंग भी रेकॉर्ड समय में पूरी की। 1942 में नूर को चर्चिल के नेतृत्व में सिक्रेट ओपरेशन एक्सेकुटिव (SOE) के लिए चुना गया। उनको ऑर्डर था नाज़ी सेना (हिटलर सेना) के खिलाफ आंदोलनों को बढ़ावा देना, नाज़ी सेना की खूफिया जानकारी का पता लगाना और उनके कैंप तहस नहस करना।
जून 1943 को नूर इनायत पेरिस में भेजी गई। उस समय 29 वर्षीय नूर फ्रांस की पहली और इकलौती अंडरकवर रेडियो ओपरेटर थी। मिशन शुरू होने के करीब तुरंत बाद ही नाज़ी सेना को खूफिया मिशन की भनक ले गई और उन्होंने जासूसों को पकड़ने की मुहीम छेड़ी। किसी तरह नूर उनके चंगुल से बच गई पर मुहीम के अंत में वो फ्रांस में अकेली जासूस बची थी। चर्चिल की टीम ने उन्हे वहाँ से सुरक्षित निकालने का न्यौता दिया लेकिन उन्होंने अपना मिशन पूरा किये बिना आने से साफ मना कर दिया।
इसके बाद जो उन्होंने जो किया उसकी किसी ने कल्पना भी नही की थी। रोज़ भेस बदल के फ्रांस के अलग अलग जगहों पर से सारी जानकारी अकेले लंदन तक पहुंचाना। अगले 3 महीने तक नूर नज़ी सेना की खूफिया जानकारी अपनी टीम तक पहुँचाती रही। इसका मतलब लोगों की टीम का काम नूर ने अकेले किया।
आखिरकार नूर को नाज़ी सेना ने पकड़ लिया। लेकिन वो लड़ती रही। गवाहों की मानें तो नाज़ी सेना के मुस्टंडे सैनिक की ज़रूरत पड़ी थी नूर को काबू में करने के लिए। उस वक्त में टेक्नोलॉजी की कमी के चलते एक औसत सीक्रेट रेडियो ओपरेटर य जासूस के पकडे जाने से पहले का कार्यकाल करीब 6 हफ्तों का होता था। नूर अकेले के दम पर इससे तीन गुना ज्यादा समय तक टिकी रहीं।
नूर ने 2 बार जेल से भागने की कोशिश की पर नाकामयाब हुई। नाज़ी सेना उन्हे सिक्कड़ों में बांध कर रखती थी और बेपनाह टॉर्चर करके पूछताछ करती थी। लेकिन इसके बाद भी वो लड़की जो पहली बार जासूसी के टेस्ट में फेल हुई थी, नाज़ी सेना को कुछ नही बताई।
साल भर जेल में रहने के बाद नूर को दचाउ कैंप में दो और जासूसों के साथ भेज दिया गया। उसके साथियों को कैंप पहुँचते ही मार ड़ाला गया, नूर को कुछ महीने और टॉर्चर किया। 13 सितंबर, 1944 को नूर को गोली मार दी गई। मारे जाने से पहले वो जल्लाद को चिल्ला कर बोलीं- liberte (“आजादी”- हिटलर के ख़िलाफ़ दुनियाभर मे चला नारा)
युद्ध के बाद नूर को ब्रिटेन के सबसे ऊँचे पदक जॉर्ज क्रॉस समेत दर्जनों अवार्ड से नवाजा गया।
नाज़ी सेना से लड़ते लड़ते नूर हिंदुस्तान को नहीं भूली। एक इंटरव्यू के दौरान नूर ने साफ कहा की विश्वयुद्ध के बाद वो भारत जाकर वहाँ के स्वतंत्रता आंदोलन में लड़ना चाहेंगी। यह बयान उन्होंने तब दिया जब उनका मिशन खुद ब्रिटेन के हाथों में था और वो अपनी नौकरी और जान से हाथ धो सकती थी।
2006 मे शर्बानी बसु ने नूर की जीवनी “spy princess” (जासूस शहज़ादी) लिखी जिसे बहुत जल्द हॉलीवुड एक फिल्म देने की तैयारी में है। अब वक्त है की हिंदुस्तान अपनी इस बहादुर शहज़ादी को जाने और उसके जीवन को सराहे। जैसे शर्बानी बसु कहती हैं-
“आज के देश और समाज की हालत को देखते हुए बहुत जरूरी है कि हम नूर को जानें, उसके संदेश और शौर्य से सीखें और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की जुर्रत करें”

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