तस्वीर गूगल से ली गयी है

आजकल कुछ नौजवान डॉ० तनवीर हसन साहब से उनके काम का हिसाब माँग रहे है इसलिए उनकी हौसलाफजाई करनी चाहिये। एक विधानसभा क्षेत्र और लोकसभा क्षेत्र के कार्यों का लेखा-जोखा उस क्षेत्र के विधायक और सांसद से होना चाहिये। लोग बड़ी गर्व के साथ बेगूसराय को लेनिनग्राद और मास्को बताते है। उस बेगूसराय मे लंबे समय तक कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसदों और विधायकों का कब्जा रहा है। इसलिए सीपीआई के नेताओं को भी आगे आकर निम्नलिखित सवालों का जवाब देना चाहिये। कितने गरीब, मजदूर, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भूमि आवंटित हुआ? कितने परिवारों को बीपीएल कार्ड दिलाया गया? कितने वृद्धों को को वृद्धा पेंशन योजना का लाभ मिला? कितने परिवारों को इन्दिरा आवास योजना से लाभान्वित किया गया? कितने परिवारों को जनवितरण प्रणाली केंद्र से उचित खाद्य-सामग्री मिला? कितने परिवारों को रोजगार से जोड़ने के लिए क्षेत्र मे किसी स्कीम से जोड़ा गया? कितने मजदूरों को नरेगा के तहत लाभ दिलाया गया? कितने स्कूल खुलवाए गये? कितने कॉलेज खुले? कितने विश्वविधालय खुले? कितने कल-कारखाने खुले? ऐसे अनगिनत सवाल है जिसका जवाब सीपीआई के लोगों को आगे बढ़कर देना चाहिये क्योंकि पूर्व के बलिया लोकसभा क्षेत्र मे तीन बार और बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र मे एक बार सीपीआई के सांसद रहे है।

बखरी विधानसभा मे दस बार, पूर्व के बरौनी विधानसभा से आठ बार, मटिहानी विधानसभा से पाँच बार, बेगूसराय विधानसभा से तीन बार, तेघरा विधानसभा मे दो बार, चेरिया बरियारपुर विधानसभा से सीपीआई के विधायक रहे है। यही सवाल भाजपा और जदयु के सांसदों और विधायकों से भी होना चाहिये। क्योंकि इनलोगों ने ही बेगूसराय का प्रतिनिधित्व लम्बे समय तक किया है। राज्य में सरकार किसी भी पार्टी की रहे। मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा, लालू यादव या नितीश कुमार रहे। लेकिन क्षेत्र के मुद्दों को उठाने की ज़िम्मेदारी तो क्षेत्र के प्रतिनिधि की बनती है। क्या सीपीआई के विधायकों एवं सांसदों को किसी ने विधानसभा में माँग रखने से रोका था? सच्चाई यही है की आजतक सीपीआई के प्रतिनिधियों की तरफ से भी इस तरफ कोई ठोस पहल ही नहीं किया गया।

अक्सर बरौनी तेल-शोधक कारख़ाना को लेकर सीपीआई के लोग क्रेडिट लेते है। लेकिन ईमानदारी से बताये की सीपीआई का बरौनी तेल शोधक कारख़ाना के निर्माण मे क्या योगदान रहा है? हाँ, निर्माण होने के बाद ट्रेड यूनियन के नाम पर बेगूसराय मे कम्यूनिस्ट का फैलाव जरूर हुआ है। बरौनी तेल शोधक कारख़ाना की बुनियाद प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत 1960 में पड़ी थी और शुरुआत 1964 में हुआ था। उस समय भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे जब्कि बिहार के मुख्यमंत्री काँग्रेस पार्टी के केबी सहाय थे। बेगूसराय के सांसद काँग्रेस पार्टी के मथुरा प्रसाद मिश्रा थे। जब्कि बेगूसराय मे कम्यूनिस्ट पार्टी के पहले सांसद के रूप मे योगेन्द्र शर्मा 1967 मे चुनाव जीते थे। फिर बरौनी तेल शोधक कारख़ाना मे सीपीआई के लोगों का क्या योगदान है? यह प्रोजेक्ट स्पष्ट रूप से काँग्रेस की पॉलिसी का हिस्सा था और नेहरू जी की गुटनिरपेक्ष देशों के गठजोड़ का परिणाम था की सोवियत यूनियन और रोमानिया ने बरौनी तेल शोधक कारख़ाना के लिए धन उपलब्ध कराया था।

इनसब के बावजूद आजतक बेगूसराय में जीडी कॉलेज, स्थापना-1945, और एसके महिला कॉलेज- स्थापना 1958, को छोडकर कुछ भी नज़र नहीं आता है? मॉस्को जाकर शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग आजतक मिनी मास्को बेगूसराय मे विश्वविधालय तो दूर एक ढ़ंग का कॉलेज तक नहीं खोल सके है। आज भी बेगूसराय के लोग दरभंगा, भागलपुर, पटना और मुंगेर जाकर शिक्षा प्राप्त कर रहे है। बल्कि मुंगेर और बेगूसराय कभी एक हुआ करता था। मगर आज मुंगेर में विश्वविधालय खुल गया और बेगूसराय को क्या मिला? क्या लेनिनग्राद और मिनी मास्को पर गर्व करने वाले लोगों को इसबात का जवाब नहीं देना चाहिये? बेगूसराय से काफी छात्र मॉस्को और सोवियत यूनियन पढ़ने गये थे। सीपीआई को चाहिये की मास्को जाकर पढ़ाई करने वाले उन छात्रों की भी एक लिस्ट जारी करे ताकि यह पता चल सके की उन छात्रों मे कितने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के छात्र शामिल है? एक तरफ बखरी विधानसभा क्षेत्र से तीन बार के दलित विधायक काम्रेड रमविनोद पासवान के पूत्र संजीव आज भी रोड के किनारे ठेला लगाकर पान बेचने पर मजबूर है और बड़ा बेटा राजू पासवान पैसे के कमी के कारण इलाज़ बिना बीमारी से मृत्यु हो गयी। दूसरी तरफ उसी बखरी विधानसभा के मामूली अंचल मंत्री ग्राम छतौना निवासी रामकरन सिंह के पुत्र मॉस्को से शिक्षा प्राप्त करके आते है। यह कैसा सामाजिक न्याय है की एक दलित विधायक का बेटा पान दुकान चला रहा है जब्कि मामूली अंचल मंत्री भूमिहार का बेटा मॉस्को से पढ़ाई करके लौटता है?

बेगूसराय में कम्यूनिस्ट आंदोलन मे सैकड़ों दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यकों ने अपने जान की कुर्बानी दिया है। काम्रेड सूर्यनारायन सिंह, काम्रेड चंदेश्वरी सिंह, काम्रेड भासों सिंह, काम्रेड चन्द्रशेखर सिंह जैसे सवर्ण नेताओं सहित दर्जनों सवर्ण काम्रेड के शहीद द्वार मिल जाते है। लेकिन दलित और ओबीसी समाज से आने वाले सैकड़ों काम्रेड की शहादत पर एक शहीद द्वार तो बहुत दूर की बात है जब्कि उनकी शहादत तक को याद नहीं किया जाता है। मुझें तो बेगूसराय मे दलित और पिछड़ों के शहीद द्वार एक भी नहीं मिले बाकी को खोजने की ज़िम्मेदारी पाठकों की है।

चलिये मान लेते है की सीपीआई दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के भागीदारी की बात करती है। ठीक है, जब से सीपीआई बेगूसराय मे है तब से आजतक कितने अल्पसंख्यक सीपीआई के जिला सेक्रेटरी बनाये गये? वर्तमान मे बेगूसराय जिला सीपीआई मे कितने अल्पसंख्यक सेक्रेटरी के पद पर है?आज एक भी दलित सीपीआई जिला कमिटी मे किसी पद पर नहीं है। जब्कि ओबीसी से एक कमली महतों ही जिला मे पदाधिकारी है। इन दो सवालों का जवाब सीपीआई को जरूर देना चाहिये ताकि अल्पसंख्यकों की भागीदारी का मतलब समझ मे आए।

बलिया प्रखण्ड प्रमुख काम्रेड महेश पासवान की 1 जनवरी, 2003 को ह्त्या कर दी गयी। मटिहानी प्रखण्ड के मुखिया काम्रेड लक्ष्मी पासवान की ह्त्या कर दी गयी। मटिहानी विधानसभा सामान्य क्षेत्र से दलित नेता लक्ष्मी पासवान ने कम्यूनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ने का घोषणा कर दिया था। परिणामस्वरूप सामान्य सीट से उम्मीदवारी रोकने के लिए काम्रेड लक्ष्मी पासवान की ह्त्या कर दी गयी।  बहुजन समाज पार्टी से साहनी जी को लगभग 22 हजार मत प्राप्त हुआ था। सहनी जी विधायकी के दावेदार हो गए थे। परिणामस्वरूप उनकी भी ह्त्या कर दी गयी। आखिर ऐसे कैसे संभव हुआ की जब बेगूसराय के दलित समाज में जब नेतृत्व का उभार होता था तब नेताओं की ह्त्या हो जाती थी?

बेगूसराय सदर प्रखण्ड मे कुसमहौत ग्राम में कृषि फॉर्म है। जब काम्रेड चतुरानन्द मिश्र कृषि मंत्री बने तब कृषि फॉर्म मे 60 लोगों की बहाली हुई। जिसमें दलित समुदाय से मात्र दो कर्मचारी की बहाली हुई। जब्कि शेष के 58 कर्मचारी सवर्ण समाज के लोग थे। उस कृषि फॉर्म मे एक भी कर्मचारी अल्पसंख्यक समाज से बहाल नहीं किया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है की पूर्व कम्यूनिस्ट सांसद काम्रेड शत्रुघ्न सिंह के पूत्र और मजदूर एवं कर्मचारी संघ (एटक) के नेता काम्रेड चंदेश्वरी सिंह के पूत्र की बहाली भी हुई थी। लेकिन यह लोग कभी नौकरी पर जाते ही नहीं है।

1974 के छात्र आंदोलन के बाद बेगूसराय की राजनीति मे डॉ० तनवीर हसन का उदय होता है। बिहार प्रदेश छात्र सभा के अध्यक्ष बनाये जाते है। जेपी आंदोलन मे सक्रियता के कारण जेल भी जाना पड़ता है। 1985 मे मॉस्को मे आयोजित विश्व यूथ लीडरशिप सम्मेलन मे भारत का प्रतिनिधित्व करते है। ललित नारायण मिथिला विश्वविधालय में सीनेट के सदस्य बनाये जाते है। युवा जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये। कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह, देवीलाल, कांशीरम इत्यादि के सानिध्य मे दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक के भागीदारी के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर तक उठाया। लेकिन जब 1985 के विधानसभा चुनाव मे उम्मीदवार बनते है तब साजिश करके चुनाव हरा दिया जाता है। चुनाव हराने वालों की मानसिकता को समझने की जरूरत है। चुनाव हराने मे कोई और लोग नहीं थे बल्कि वही लोग थे जो चिकनी-चुपड़ी बातें करके दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों की भागीदारी की बात करते थे। लेकिन दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समाज के एक नेतृत्व के उभार को पसंद नहीं करते थे। आज फिर उसी मानसिकता के लोग एकबार पुनः सक्रिय है।

लेखक: टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई, से दलित ट्राइबल स्टडिज़ में मास्टर डिग्री है।

 

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