फोटो गूगल से लिया गया है

ट्रेनिंग खत्म हो चुकी थी. दो अक्टूबर को मैं और मेरे साथ जॉइन करने वाले सभी ऑफ़िस पहुंच चुके थे. न्यूज़रूम में ये हमारा पहला दिन था. बीबीसी के लिए ये दिन बहुत ख़ास था क्योंकि इस दिन बीबीसी हिंदी का टीवी बुलेटिन शुरू हो रहा था, जिसके उपलक्ष्य में बीबीसी के डायरेक्टर जनरल टॉनी हॉल दिल्ली ऑफिस आए थे. ऑफिस में माहौल किसी त्यौहार से कम नहीं था.

टॉनी हॉल ने सभी से एक-एक कर हाथ मिलाया. उनका इस तरह मिलने का अंदाज अच्छा लगा. न्यूज़रूम में माहौल एकदम ‘कूल’ बनाया हुआ था. सभी जगह हाहा-हीही की आवाज सुनाई पड़ रही थी. देखने में तो लग रहा था कि सब लोग कितने अच्छे हैं, बॉस के साथ भी माहौल को हल्का बनाया हुआ है. इसी बीच परिचय का सिलसिला भी चल रहा था.

अब धीरे-धीरे सबकी शिफ्ट लगनी शुरू हो गई थी. कोई रेडियो में गया तो कोई टीवी में. किसी को मनोरंजन और खेल मिला तो किसी को कुछ. मेरे हिस्से आया डेस्क.

यहीं से वो सब शुरू हुआ जो मुझे बेहद अज़ीब लगा. बीबीसी आने से पहले यहां के बारे में बहुत सुना भी था और पढ़ा भी था. बीबीसी के लिए एक सेट और सकारात्मक सोच बनी हुई थी. लेकिन वो समय के साथ-साथ धुंधली होने लगी. वो लोग जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अच्छी पहचान बना रखी है, जिन्हें बहुत लिबरल/प्रोग्रेसिव समझा जाता था, जिन्हें पढ़कर लगता था कि ये हर किसी के लिए कितना अच्छा सोचते हैं. मुझे भी इनके जैसा पत्रकार बनना है. मैं भी अपने जीवन में उन लोगों के काम आना चाहती थी जिन्हें कहीं जगह नहीं मिलती. उनकी आवाज़ बनना चाहती थी जिनकी कोई नहीं सुनता.

वंचित और शोषितों के लिए पत्रकारिता करने वाला बीबीसी अंदर से मुझे कुछ और ही लगा. यहां भी वे लोग मौजूद थे, जो इनके नाम पर अपना पेज़ और नाम तो चमकाना चाहते हैं लेकिन न्यूज़रूम में इन्हें बर्दाश्त नहीं करना चाहते थे.

यहां महिला विरोधी, दलित विरोधी टिप्पणी भी होती थी और उनका मज़ाक भी बनाया जाता. कई बार इस तरह की टिप्पणी वो इतनी आसानी से कर देते कि मैं सोच में पड़ जाती कि कितना कुछ है इनके मन में. शायद एक मर्यादा के तहत बंधे होने के कारण ये अपने लेखन में वो बाते ना ला पाते हो, पर उसे जुबां पर लाने से रोक पाना इनके बस में नहीं था.

इनके लिए वो सब एक मज़ाक होता, माहौल को हल्का करने का साधन लेकिन उस मज़ाक में उन सबकी सोच की बू आती थी. जिन्हें आदर्श समझा था वो तो कुछ और ही निकले. और इस दरमियां शुरू हुआ मेरी जिंदगी का एक नया अध्याय.

“आप ही मीना हो?”
“हां, क्यों क्या हुआ?”
“नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही.”
“आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?”
“नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं.”
(थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद)
“बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी.”
“मुझसे किसी ने कहा था कि अब तो आपके लोग भी हमारे साथ बैठ कर काम करेंगे.”
———————–
यह सुन मैं थोड़ी देर शांत बैठ गई. मैंने उनसे जब पूछा कि आपको ये किसने कहा तो उन्होंने बताने से मना कर दिया.
बीबीसी में मेरी नौकरी करने के ऊपर की गई यह टिप्पणी किसने बताई, मैं उनका नाम जगजाहिर नहीं करना चाहती क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरी वज़ह से किसी की नौकरी ख़तरे में पड़ जाए. लेकिन बताना चाहूंगी वो व्यक्ति दलित समुदाय से आते हैं और वे पत्रकार नहीं हैं. वो बीबीसी के दफ़्तर में एक साधारण कर्मी हैं.

ये बिल्कुल शुरूआती दिनों की बात है जब मेरी शिफ्ट डेस्क पर लगनी शुरू ही हुई थी. ये बात मेरे दिमाग में खटक रही थी कि आख़िर ऐसा कोई क्यों बोलेगा और ऐसा कौन बोल सकता है?

मैंने घर जाकर ये बात सबसे पहले राजा (जो अब मेरे पति हैं) को बताई. राजा ने सुनते ही मुझे डांट दिया कि “तुम पागल हो किसी की भी बातों में आ जाती हो. कोई कुछ भी बोले तुम बस अपने काम पर ध्यान लगाओ. इतनी अच्छी जगह गई हो बस अच्छे से काम करो. कुछ नहीं रखा इन सब बातों में. बीबीसी तो कम से कम ऐसा नहीं है, जहां इस तरह के लोग हों, हां और जगह तुम्हें मिल जाएंगे लेकिन बीबीसी में नहीं. वहां लोग खुद दलित-मुस्लिम पर स्टोरी करते हैं, लिखते हैं. वहां सब अच्छे लोग हैं और इन सब बातों को परे करो यार…”

मैं ये सब सुनकर चुप हो गई और वो सब भूल गई कि किसने क्या कहा है. अब जब भी उस व्यक्ति से मिलती तो थोड़ा इग्नोर करती और वो बात तो बिल्कुल नहीं छेड़ती जिसके लिए राजा ने गुस्सा किया था. मुझे भी लगा कि शायद मैं ही ज्यादा सोचने लगी थी.

शुरू में सब ठीक चल रहा था. मैं अपनी शिफ़्ट करती, सबके साथ व्यवहार भी सही था. हां, मैं बहुत बातूनी नहीं हूं इसलिए औरों की तरह मुझे फालतू बात करनी नहीं आती. मुझे पसंद है अपना काम करना और काम से काम रखना. मैं जब तक किसी पर पूरी तरह विश्वास नहीं करती तब तक आसानी से बात करने में सहज महसूस नहीं करती. लेकिन इस वज़ह से कुछ लोग मुझ से कटने लगेगें, ये नहीं पता था. मुझे एक बार को यही कारण लगा लेकिन धीरे-धीरे समझ बात समझ में आने लगी कि इसकी वज़ह कुछ और है. और वो वज़ह वही वज़ह थी जो उस दफ़्तर के उस साधारण दलित कर्मी ने बताई थी.

To be continued…

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