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नेहरु आज़ाद भारत के पहले  प्रधानमंत्री बने ,उनके के योगदान को देश क्या पूरी दुनिया नही भुला सकती है | लेकिन प्रोपेगेंडा नाम की एक चीज़ है जोकि आज ही नही वज़ूद में आई है यह हिटलर के दौर से चली आ रही है, लेकिन आज सोशल मीडिया के दौर में ये चीज़ एक बड़ा भयानक रूप ले चुकी है  क्योंकि सूचनाओ की बाढ़ सी आ गयी दर्शक और पाठक के लिए सोशल मीडिया वरदान और अभिशाप दोनों साबित हुए है | क्योंकि अब यह बड़ी चुनोती है आप सही खबर ढूँढ सके भाग दौड़ भरी जिंदगी में दर्शक और पाठक के लिए ये आसान काम भी नही है |

अगर हम भारतीय मीडिया के बात करे तो (PRESS FREEDOM INDEX ) में हमारा स्थान 140 है विश्व स्तर पर जोकि एक अच्छी बात नही है ये 2019 में जारी की गई लिस्ट है कुल 180 देशो में हम 140 पर आए पहेले पर नोर्वे रहा | तो इससे भी हम अपनी पत्रकारिता के स्तर का अंदाज़ा लगा सकते है |

झूठ तो काफी ज्यादा फैलाए गए है हम बस कुछ की चर्चा करेंगे

भगत सिंह से जेल में मिलने नहीं गए

नेहरू के बारे में यह मिथक यह भी प्रचलित है कि जब क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह जेल में बंद थे और उन्हें फांसी की सजा दी गई थी तो नेहरू उनसे मिलने कभी भी जेल में नहीं गए. यह बात गलत है. नेहरू देश के उन चुनींदा बड़े नेताओं में से थे जो जेल में जाकर भगत सिंह और उनके साथि‍यों से मिले. नेहरू ने भगत सिंह के हिंसा के रास्ते की कभी तारीफ नहीं की, लेकिन उनकी बहादुरी और देशप्रेम की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की. महात्मा गांधी के अलावा भगत सिंह ही ऐसे व्यक्ति थे जिनकी नेहरू ने सबसे ज्यादा तारीफ की. 8 अगस्त 1929 को जवाहर लाल नेहरू ने जेल में बंद भगत सिंह और उनके साथि‍यों से मुलाकात की और 9 अगस्त को उन्होंने लाहौर में वक्तव्य दिया. तो यह बात भी एक झूठ के रूप में प्रचारित की जाती है जबकि सच ये है नेहरु मिलने गए थे |

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अनुच्छेद 370 नेहरू की वजह से ही लागू हुआ

एक यह धारणा बनी हुई कि अनुच्छेद 370 पंडित नेहरू की वजह से ही लागू हुआ और सरदार पटेल इसके विरोधी थे. लेकिन यह बात भी सच नहीं है. सच तो यह है कि सरदार पटेल ने अनुच्छेद 370 को कश्मीर के लिए जरूरी बताया था. जब संविधान सभा में अनुच्छेद 370 पर बहस हो रही थी, तो उस समय नेहरू देश से बाहर थे और सरदार पटेल ने इस पर चले बहस की जानकारी नेहरू को दी थी. खुद सरदार पटेल ने संविधान सभा में बहस के दौरान इस बारे में तर्क दिया था कि कश्मीर की विशेष समस्याओं को देखते हुए उसके लिए अनुच्छेद 370 जरूरी है.

जवाहर लाल नेहरू ने 25 जुलाई 1952 को मुख्यमंत्रियों को लिखे अपने एक पत्र में कहा था, ‘जब नवंबर 1949 में हम भारत के संविधान को अंतिम रूप दे रहे थे, तब सरदार पटेल ने इस मामले को देखा. तब उन्होंने जम्मू और कश्मीर को हमारे संविधान में एक विशेष किंतु संक्रमणकालीन दर्जा दिया. इस दर्जे को संविधान में अनुच्छेद 370 के रूप में दर्ज किया गया. इसके अलावा 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से भी इसे दर्ज किया गया. इस अनुच्छेद के माध्यम से और इस आदेश के माध्यम से हमारे संविधान के कुछ ही हिस्से कश्मीर पर लागू होते हैं.’

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सरदार पटेल और नेहरू में नहीं पटती थी

नेहरु और सरदार पटेल वाला झूठ तो बहुत ही फैलाया गया है और यह आज बभी चलता है ,यह सच है कि पंडित नेहरू और पटेल के बीच कई मसलों पर तीखे वैचारिक मतभेद रहे हैं, लेकिन यहां भी यह कहा जा सकता है कि यह मनभेद नहीं था. दोनों में आर्थ‍िक मसलों और सांप्रदायिकता के मसलों पर कुछ वैचारिक मतभेद थे. कई बार दोनों के बीच ऐसे तीखे वैचारिक मतभेद हुए कि दोनों इस्तीफा देने तक को तैयार हो गए. लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए दोनों मिलजुलकर काम करते रहे. नेहरू के मार्गदर्शन में ही सरदार पटेल ने देश की 500 से भी ज्यादा रियासतों के एकीकरण और विलय का अनूठा कार्य पूरा किया.

महात्मा गांधी की हत्या के बाद काफी दुखी सरदार पटेल ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने का फैसला किया. इसके बाद नेहरू ने उन्हें पत्र लिखा: ‘जब बापू जीवित थे तब हमने साथ-साथ बापू से मिलने और उनसे उन बातों की चर्चा करने की आशा रखी थी, जिन्होंने हमें कुछ हद तक परेशान कर रखा था. अपने अं‍तिम पत्र में मैंने यह आशा व्यक्त की थी‍ कि मत और स्वभाव के कुछ मतभेदों के बावजूद हमें साथ-साथ काम करते रहना चाहिए, जैसा कि हमने इतने लंबे समय तक किया है. यह जानकर मुझे आनंद होता है कि बापू की अंतिम राय भी यही थी.

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  अंग्रेजी भाषा- कल्चर को बढ़ावा दिया, और इसके साथ यह की वह संस्कर्त भाषा के विरोधी थे

आजादी के बाद देश में भाषा का मुद्दा गरमा गया. तब नेहरू ने 6 दिसंबर, 1948 को सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा, ‘भाषा का सवाल बहुत तर्क-वितर्क का विषय बन गया है. मेरे ख्याल से राज्य की बुनियादी नीति यह होनी चाहिए कि बच्चे की बुनियादी शि‍क्षा उसकी मातृभाषा में हो, ऐसा करने पर बहुत से बच्चों को इससे फायदा होगा.’

पंडित जी लन्दन में ही पढ़ कर आए थे ,लेकिन इस बात में कोई शक़ नही है कि उन्हें हिंदुस्तान की मिट्टी से बहुत प्यार था |लेकिन अक्सर लोग उनके बारे में यह मान लेते है की उन्होंने देश में अंग्रेजी भाषा, संस्कृति को बढ़ावा दिया. लेकिन सच तो यह है कि वह मातृभाषा, संस्कृत और स्वदेशी-खादी को बढ़ावा देने के समर्थक थे |

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