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दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत (70 में से 62 सीटें पर हुई है) भारतीय जनता पार्टी के पतन के दिल्ली चुनाव में कई कारण रहे और उसका दिल्ली में सरकार बनाने का सपना 22 साल बाद एक बार फिर सपना बन के रह गया .

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भाजपा ने इस बार इन चुनावों में अपने तरकश के सारे तीर अजमा लिए जिसमे शुमार कई  सांसद और शीर्ष नेता – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ,केंद्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी और इसके आलवा उनके सबसे बड़े चुनावी रणनीति बनाने वाले गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली चुनाव में कई रैलिया की और यहा तक के उन्हें गली गली में पर्चे बाटते हुए तक देखा गया. दिल्ली के मतदाताओं को लुभाने के लिए बीजेपी ने हर कोशिश की लेकिन अंततः वे  असफल  रहे। अपने चुनाव अभियान के दौरान, भाजपा द्वारा विषैले और झूठ को खूब व्यापक रूप से फैलाए गया.

केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री ने तो हद ही करदी चुनाव में विकास के बजाय चुनावी रैली में भीड़ को गोली मारने के नारे लगवाए.जिसके कुछ दिन बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पास एक युवक ने प्रदशन कर रहे छात्रों पर गोली चला दी और एक स्टूडेंट के हाथ में गोली लग गई , एक और अन्य भाजपा नेता ने चेतावनी दी कि चुनाव भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध है  एक बीजेपी सांसद ने यह भी कहा की अगर दिल्ली में बीजेपी नही आई तो ये  शाहीन बाग के  ज्यादातर प्रदर्शनकारी हिंदू इलाकों में बहनों और बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे , उन्हें उठा लेंगे .

यह बहुत ज्यादा यकीन दिलाने की कोशिश की गई की यह चुनाव स्पष्ट रूप से हिन्दू बनाम मुसलमान और भारत बनाम पाकिस्तान की तर्ज़ पर लड़ा जा रहा है .

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8 फरवरी को, दिल्ली के मतदाताओं, जिनमें से 80% से अधिक हिंदू हैं, ने न केवल अरविंद केजरीवाल की AAP  की बिजली और पानी के लिए अपना वोट डाला, बल्कि बीजेपी के इस शातिर कार्ड हिन्दू बनाम मुसलमान में नही आया . भाजपा इन चुनावो में इस गलतफ़हमी में गी रही थी की  अधिकांश हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति गहरी नफरत है मगर ये यह बात  गलत साबित हुई .

पिछले कुछ वर्षों में, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड के बड़े पैमाने पर हिंदू मतदाताओं ने राज्य चुनावों के दौरान भाजपा के सांप्रदायिक अभियानों को खारिज किया और इबीजेपी को  सत्ता से बाहर कर दिया है। हरियाणा और गुजरात राज्य चुनावों में, भाजपा की सीटों की संख्या में काफी कमी आई थी, हालांकि पार्टी सत्ता में बनी रही। उत्तर प्रदेश मुख्य अपवाद था, जहाँ भाजपा ने 2017 के राज्य चुनाव में स्पष्ट बहुमत हासिल किया।

भाजपा के अभियानों ने न केवल इस तथ्य को उजागर करने में मदद की है कि अधिकांश हिंदू गैर-सांप्रदायिक हैं, बल्कि उन्होंने मुसलमानों की सेवा भी की है। 2014 से लगातार मुस्लिमों पर लव जिहाद ,आतंकवाद, पाकिस्तान का समर्थन, अलगाववाद और गोमांस खाने वालों और गाय तस्करों के क्रूर झूठ को बढ़ावा देने के आरोपों के माध्यम से मुसलमानों के खिलाफ करने में कामयाबी भी हासिल की और 2019 में प्रचंड बहुमत पाया लेकिन अब तस्वीर पलट रही है .

मुंबई और पटना से लेकर उत्तराखंड के छोटे शहरों और  तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक, देश भर में एक प्रसिद्ध असंतुष्ट समुदाय एकजुट हो गया । नागरिकता (संशोधन) अधिनियम केवल मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में देश भर के दर्जनों बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण शाहीन बाग़ के रूप में अपनी नाराज़गी दर्ज़ कराई और पुरे भारत में NRC और  CAA के खिलाफ विरोध दर्ज़ किया . बड़े पैमाने पर विनम्र, श्रमशील परिवारों से, आई इन महिलाओं ने जबरदस्त और बार-बार अपनी देशभक्ति, अपनी पितृसत्ता की अस्वीकृति और उनके धार्मिक गौरव को व्यक्त किया।

उनके इस संकल्प में, इन महिलाओं को सभी समुदायों के लाखों नागरिकों का मुखर रूप से समर्थन मिला और सबसे महत्वपूर्ण रूप से जामिया,दिल्ली यूनिवर्सिटी ,जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी , अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और इसके साथ साथ अहमदाबाद में भारतीय प्रबंधन संस्थान से लेकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अलावा देश भर के 50 से ज्यादा संस्थानों का इनको समर्थन मिला .

कुछ भी  कहें लेकिन आम आदमी पार्टी ने 62 सीट हासिल करके एक नई तरह की राजनीती को जन्म दिया है कि काम बोलता है उन्होंने केवल अपने काम आधार पर वोट मांगा और उन्हें आखिर वोट मिला.

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