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इस बार की गर्मियां भीषण होंगी। इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं। यूरोप के तमाम देशों में बीता जनवरी माह पिछले तीस सालों में सबसे ज्यादा गर्म रहा है। यहां तक कि बीते तीस सालों के औसत तापमान की तुलना में इसमें 3.1 डिग्री सेल्सियस का इजाफा भी दर्ज किया जा रहा है।

दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में अभी भी गुलाबी ठंड का असर बना हुआ है। इसके पीछे मुख्यतौर पर हिमालय के क्षेत्रों में पिछले दिनों हुए हिमपात को कारण माना जा रहा है। हिमपात के बाद अब बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही है और हवा उधर की तरफ से ही आ रही है। इसके चलते, खासतौर पर सुबह-शाम को अच्छी ठंड महसूस की जा रही है। दिल्ली-एनसीआर में दिन भर खुली धूप निकलने के बावजूद हवा की ठंड के चलते तापमान अभी सामान्य से नीचे बना हुआ है। लेकिन, इससे ज्यादा धोखा खाने की जरूरत नहीं है। जो संकेत मिल रहे हैं वे यही कहते हैं कि इस बार कि गर्मियां पहले से भयंकर होने वाली हैं।

यूं तो पिछले साल भी भयंकर गर्मियां पड़ी थीं। दिल्ली के पालम में ऐतिहासिक तौर पर सबसे ज्यादा गर्म दिन रिकार्ड किया गया था। बिहार में कुछ जगहों पर लोगों को लू से बचाने के लिए धारा 144 तक लगानी पड़ गई थी। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में इस बार का जनवरी माह कई सालों बाद सबसे ज्यादा गर्म साल के तौर पर दर्ज किया गया है। जबकि, यूरोप का मौसम भी कुछ इसी तरह का रंग दिखा रहा है।

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यूरोपीय एजेंसी कॉपरनिकस क्लाईमेट चेंज सर्विस यानी ट्रिपल थ्री एस का आकलन है कि 1981-2010 के औसत तापमान की तुलना में जनवरी 2020 के तापमान में 0.77 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले वर्ष 2016 में भी भयंकर गर्मियां रिकार्ड की गई थीं। ट्रिपल थ्री एस का कहना है कि बीते तीस सालों के औसत के हिसाब से देखा जाए तो इस बार की जनवरी के तापमान में 3.1 डिग्री का इजाफा हुआ है। उत्तर यूरोपीय देशों में खासतौर पर तापमान में इजाफा दर्ज किया गया है। नार्वे और रूस जैसे देश जनवरी में अविश्वनीय तरीके से गरम रहे हैं और यहां पर बीते तीस सालों की तुलना में छह डिग्री सेल्सियस तक का इजाफा देखा गया है। अमेरिका, पूर्वी कनाडा, जापान, पूर्वी चीन, दक्षिण एशिया, ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स और एंटार्टिका में कई जगहों पर भी गर्मियों का ऐसा ही ट्रेंड देखा जा रहा है।

तापमान के आंकड़े बताते हैं कि सात सबसे ज्यादा गर्म साल पिछले दशक यानी 2010-2019 के बीच आए थे और इसमें भी पांच सबसे ज्यादा गर्म वर्ष 2015 के बाद रिकार्ड किए गए। पिछला दशक सबसे ज्यादा गरम दशक रहा है और इस दशक की शुरुआत में भी कुछ इसी तरह की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। जब तापमान लगातार ज्यादा आने लगता है तो कुछ दिनों में उसी ज्यादा तापमान को ही सामान्य तापमान मान लिया जाता है।

ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में हुई भारी बढ़ोतरी को वैश्विक तापमान में इजाफे के लिए जिम्मेदार माना जाता है। वर्ष 2018 में विश्व के वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा का औसत 407.4 पार्ट पर मिलियन रहा। माना जाता है कि पृथ्वी के इतिहास के बीते आठ लाख सालों में यह सबसे ज्यादा है।

धरती के इस तरह से लगातार गरम होने का खामियाजा पूरी दुनिया में ही पेड़-पौधे, जीव-जंतु मारे जा रहे हैं। आजीविका नष्ट हो रही है। पर्यावास नष्ट हो रहा है। खुद इंसान मारे जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया की आग से लेकर भारत-पाकिस्तान-सोमालिया-केन्या पर हुए टिड्डी दलों के हमले तक तमाम ऐसे तरीके हैं जिनसे इस तबाही का संकेत ज्यादा से ज्यादा भयंकरता के साथ हमारे सामने प्रकट हो रहा है।

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लेकिन, हमारी सोच के दायरे से यह सबकुछ बाहर है। आप सोचेंगे दिल्ली का माहौल चुनाव की वजह से गरम है। ऐसे में दुनिया के गरम होने की चर्चा क्यों।
चर्चा की जरूरत इसलिए है क्योंकि पूरे चुनाव में इस पर गंभीर चर्चा नहीं है। हम और आप इस मुद्दे पर वोट नहीं डालने जा रहे हैं। हमारे लिए कुछ दूसरे मुद्दे इससे ज्यादा जरूरी हैं।

यह आप सोचिए कि हमारे लिए ज्यादा जरूरी क्या है।

लेखक – कबीर संजय

 

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