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आज उच्चतम न्यायालय में 60 दिनों से ज्यादा चल रहे प्रोटेस्ट शाहीन बाग मामले पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र लोगों की अभिव्यक्ति से ही चलता है लेकिन इसकी एक सीमा है।

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा लोगों को लोकतंत्र में विरोध करने का मौलिक अधिकार है लेकिन उन्हें सड़कों को अवरुद्ध नहीं करना चाहिए। “एक संतुलन होना चाहिए। इससे अराजकता पैदा हो सकती है, “दो न्यायाधीशों वाली बेंच जिसमें संजय किशन कौल और केएम जोसेफ शामिल थे उन्होंने इसपर अपना फैसला सुनाया.

वकील अमित साहनी और भाजपा नेता नंदकिशोर गर्ग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दायर की गई थीं ताकि शीर्ष अदालत शाहीन बाग – कालिंदी कुंज रोड की नाकाबंदी को खत्म करने का आदेश दे ।

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील संजय हेगडे और साधना रामचंद्रन को प्रदर्शकारियों से बात करने की जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें प्रदर्शनकारियों से बात करके उनका प्रदर्शनस्थल यानि आन्दोलन करने वाली जगह को बदलने के लिए मनाने को भी कहा गया है। अदालत ने दोनों वकीलों से कहा है कि यदि वह चाहें तो वजाहत हबीबुल्ला को अपने साथ ले सकते हैं। साथ ही अदालत ने केंद्र, दिल्ली पुलिस और सरकार को प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए कहा। अब अगली सुनवाई सोमवार 24 फरवरी को होगी।

 

जाने वजाहत हबीबुल्लाह के बारे में क्योंकि इन्हें भी शाहीन बाग मामले में कोर्ट ने मध्यस्थता की भूमिका दी है-

भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त रहे वजाहत हबीबुल्लाह भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थता टीम में शामिल हैं। हबीबुल्ला राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं। इसके अलावा वे पंचायती राज मंत्रालय में भारत सरकार के सचिव रह चुके हैं। हबीबुल्लाह 1968 से अगस्त 2005 में अपनी सेवानिवृति तक भारतीय प्रशासनिक सेवा से अधिकारी रह चुके हैं।

इसके अलावा संशोधित नागरिकता कानून (CAA) की संवैधानिक वैधता पर गंभीर आपत्तियों का उल्लेख करते हुए 106 पूर्व नौकरशाहों द्वारा लिखे गए खुले पत्र में भी पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला शामिल थे

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