courtesy-india today

हमें कोरोना के साथ ही जीना होगा, लेकिन बचाव के साथ। यह ठीक उसी तरह है जैसे पोलियो और फ्लू के वायरस के साथ हम न चाहते हुए भी रह रहे हैं, लेकिन हमने इन पर काफी हद तक काबू पा लिया है। पिछले सवा साल में जब से कोरोना वायरस ने लोगों की नींद उड़ाई है, तब से इसके हजारों म्यूटेशन हो चुके हैं। ऐसे में कुछ सवाल लाजमी हैं कि कोरोना का नया स्ट्रेन कितना खतरनाक है? क्या नए स्ट्रेन से घबराना नहीं है?

नए स्ट्रेन से जुड़ी 5 बातें जरूर याद रखें

1. कोरोना का स्ट्रेन नया हो या पुराना मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग (6 फुट की दूरी) और हाथों का साफ रखना पड़ेगा। इससे हम वायरस के मौजूदा स्ट्रेन और भविष्य में आने वाले दूसरे स्ट्रेन से भी बचे रहेंगे।
2. चाहे कोरोना हुआ हो या न हुआ हो, वैक्सीनेशन सभी के लिए जरूरी है। वैक्सीन लगवाने के बाद भी मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग को याद रखना पड़ेगा।
3. नया स्ट्रेन या वेरीअंट बनाना हर वायरस की फितरत है। कोरोना वायरस ने भी कुछ नया नहीं किया है, इसलिए घबराना तो बिलकुल नहीं है।
4. डाइट में विटामिन (विटामिन-डी के लिए धूप को न भूलें) और मिनरल्स जरूर शामिल हों यानी 2-3 फल और 250 ग्राम हरी सब्जी हर दिन जरूर खाएं।
5. कोरोना वैक्सीन लेने के बाद नए स्ट्रेन से पूरा बचाव भले ही न हो, लेकिन शरीर में कोरोना के खिलाफ ऐंटिबॉडी बनने से नए स्ट्रेन से लड़ने में मददगार हो सकती है।

यह सही है कि बीते कुछ महीनों में हमारी कोरोना के प्रति गंभीरता कम हो गई है। इसे मास्क न लगाने, कम लगाने या फिर सही तरीके से न लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न रखने के रूप में देख सकते हैं। जब से कोरोना के खिलाफ वैक्सीनेशन की प्रक्रिया शुरू हुई है, हम कोरोना को हारा हुआ मान रहे हैं। इस तरह की सोच ही कोरोना को वापसी का मौका दे रही है। बहरहाल, मौजूदा स्थिति देखें तो कोरोना से लड़ने के लिए हमारी तैयारी पहले से ज्यादा बेहतर होनी चाहिए। मान कर चलें कि हम कोरोना को हराने ही वाले हैं, उसके इंफेक्शन को तोड़ने ही वाले हैं। वैक्सीनेशन भी शुरू हो चुका है। आगे और नई वैक्सीन भी आएंगी। वहीं, कोरोना के नए स्ट्रेन या वेरीअंट भी डिवेलप हो चुके हैं। हालांकि, देश में इसका फैलाव अभी कम है, पर हमें सावधान तो रहना ही होगा।

फिर बढ़ रहे हैं मामले…
देशभर में कोरोना के मामले फरवरी के पहले हफ्ते में कम होते हुए हर दिन 8 हजार के करीब पहुंच गए थे। तब हमें लगने लगा था कि शायद अब कोरोना आखिरी दिन गिन रहा है। इसी दौरान कोरोना वैक्सीनेशन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई। लेकिन पिछले एक-दो हफ्ते में ही चीजें बदल गईं। पूरे देश को छोड़िए सिर्फ महाराष्ट्र में ही कोरोना मरीजों का आंकड़ा 8 हजार के ऊपर जा रहा है। देश में तो यह संख्या 16 हजार से ज्यादा होने लगी है। नए इलाकों में मरीज मिल रहे हैं। महाराष्ट्र में एक ही हॉस्टल में 190 से ज्यादा छात्र कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।

इसी बीच एक और बात ने हमारी चिंता बढ़ाई है। कोरोना के नए स्ट्रेन के बारे में कहा जा रहा है कि यह पुराने से ज्यादा तेजी से इंफेक्शन फैलाता है। इसमें वायरल लोड कम होने पर भी मरीज को ज्यादा बीमार करता है। हालांकि, देश में अभी नए स्ट्रेन के मरीजों की संख्या काफी कम है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, केरल जैसे राज्यों में ही ऐसे मरीज देखे गए हैं। इनमें से अधिकांश मरीज ब्रिटेन, ब्राजील और अफ्रीका से आए और यहां कुछ लोगों के संपर्क में रहे थे। एक सच यह भी है कि भारत में भी कोरोना वायरस में कई म्यूटेशन हुए हैं, लेकिन ज्यादातर खुद ही खत्म हो गए। हमें नए या पुराने स्ट्रेन के बारे में नहीं सोचना चाहिए। इससे बचने के बारे में सोचना चाहिए।

बात कोरोना के नए वेरीअंट की…
कोरोना वायरस हो, फ्लू, पोलियो या फिर कोई भी दूसरा वायरस। हर वायरस की यह फितरत होती है कि वह खुद को बनाए रखने के लिए अपने जीनोम में बदलाव करे। इस बदलाव की जरूरत उसे इंसानी इम्यूनिटी के खिलाफ खुद को बनाए रखने के लिए होती है। वैसे वायरस में होने वाले ज्यादातर बदलाव खतरनाक नहीं होते, लेकिन कुछ बदलाव के बाद बननेवाले नए स्ट्रेन हमारे शरीर के लिए नुकसानदायक हो जाते हैं। यह सिर्फ कोरोना के मामले में नहीं है। ज्यादातर डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ को फ्लू की वैक्सीन हर बार लगानी पड़ती है क्योंकि फ्लू के नए वेरीअंट आ जाते हैं। अभी कोरोना के ब्रिटेन, ब्राजील और साउथ अफ्रीकी स्ट्रेन को लेकर जो चर्चा चल रही है, वे ऐसे ही बदलाव हैं।

वायरस और ऐंटिबॉडी में ‘शह और मात’ का खेल

  • म्यूटेशन (वायरस के जीनोम में हुआ अचानक बदलाव) हर वायरस की फितरत होती है। इसे न कोई रोक सकता है और न बदल सकता है।
  • पूरी दुनिया में कोरोना में 5000 से ज्यादा म्यूटेशन हो चुके हैं यानी इतने ही नए स्ट्रेन बन चुके हैं।
  • सिर्फ भारत में 240 से ज्यादा नए स्ट्रेन की बात सामने आ चुकी है।
  • यह भी मुमकिन है कि जीनोम रिसर्च में कमी की वजह से कई नए स्ट्रेन के बारे में पता भी न चला हो और वे खत्म हो गए होंे।
  • कोरोना के नए वैरिएंट्स आगे भी आते रहेंगे। यह रुकने वाला नहीं है। इसलिए डरना नहीं है।
  • वायरस के ज्यादातर नए स्ट्रेन कुछ मिनट, कुछ घंटे या फिर कुछ दिन में खत्म भी हो जाते हैं।
  • कुछ नए स्ट्रेन लंबे समय तक टिक जाते हैं। ये हमारे शरीर को ज्यादा नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी रखते हैं हालांकि पुराने वायरस के खिलाफ हमारा शरीर इम्यूनिटी तैयार कर लेता है। इसे हम ‘शह और मात’ का खेल भी कह सकते हैं।
  • इसे ब्रिटेन का स्ट्रेन कहा जाता है। यह सबसे पहले ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड में मिला था।
  • कोरोना के ये तीनों स्ट्रेन भारत में भी मिले हैं। इन तीनों को ही पुराने स्ट्रेन से ज्यादा खतरनाक कहा गया है, खासकर ब्रिटेन वेरीअंट को।
  • इसे पुराने से ज्यादा संक्रामक माना जा रहा है।
  • इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हम कोरोना वायरस का जो फोटो देखते हैं, उसमें प्रोटीन के स्पाइक्स बने हुए दिखते हैं। इस वायरस में उसकी संख्या ज्यादा होती है। इस वजह से यह वायरस फेफड़ों या फिर शरीर के दूसरे अंगों पर आसानी से लंबे समय तक चिपका रह सकता है।
  • ऐसा कहा जा रहा है कि शरीर में वायरल लोड कम होने पर भी यह ज्यादा इंफेक्शन फैला पाता है।
  • इसे ज्यादा संक्रामक जरूर माना गया है, पर इससे होने वाली मौत में इजाफा नहीं देखा गया है।

क्या भारत में कम हैं नए स्ट्रेन के मामले
कोरोना हुआ है या नहीं, यह जानने के लिए सबसे अहम है RT-PCR टेस्ट। इस टेस्ट से यह तो पता चल जाता है कि कोरोना हुआ है या नहीं। लेकिन हम यह नहीं जान सकते कि यह नए स्ट्रेन से हुआ है या फिर पुराने से। इसका पता सरकार लगाती है। वायरस के जीनोम की स्टडी की जाती है। यह जांच नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी, पुणे में होती है। इस जांच की जरूरत है या नहीं, इसके बारे में भी सरकार ही तय करती है। आम आदमी के लिए न अलग से जांच की जरूरत है और न वह करा सकता है। सरकार भी उन क्षेत्रों के कोरोना पॉजिटिव मरीजों पर ही नए स्ट्रेन को लेकर स्टडी करती है, जहां पर नए स्ट्रेन के मामले सामने आए हों या फिर कुछ ऐसे लक्षण उभरे हों जिनसे यह शक गहराए कि इंफेक्शन नए स्ट्रेन का हो सकता है। चूंकि इस तरह की जांच कम हो रही है, इसलिए नतीजे भी कम ही आ रहे हैं। वहीं यह भी मुमकिन है कि अपने देश में मामले भी कम ही हों। इसलिए हम यही मानकर चलें कि अभी कोरोना के नए स्ट्रेन के मरीज काफी कम हैं।

दोबारा क्यों बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले

  • यह तेजी इस वजह से है कि हम पिछले दिनों काफी लापरवाह हो गए थे। मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग की बात काफी हद तक भूल गए थे।
  • कोरोना के मामलों में आई तेजी के बाद सरकार इस बात पर खास तौर पर ध्यान रख रही है कि पहले के मुकाबले नए लक्षण तो नहीं उभर रहे। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि कोरोना के नए मामलों में नए स्ट्रेन की भूमिका है।

कोरोना के नए स्ट्रेन से लड़ने के लिए नए हथियार
बात चाहे कोरोना के नए स्ट्रेन की हो या फिर पुराने स्ट्रेन की। लड़ाई का तरीका भी वही है और हथियार भी वही हैं। हां, इसमें एक ढाल जरूर जुड़ गई है, वह है वैक्सीन। अपने पुराने हथियार में मास्क, 6 फुट की दूरी और हाथों को 20 सेकंड तक साबुन से साफ करना। अगर साबुन न हो तो सैनिटाइजर से सफाई। अगर हम इन बातों को अभी, आगे और वैक्सीन लगने के बाद भी अपनाए रखेंगे तो भविष्य में कोरोना का कितना भी शक्तिशाली स्ट्रेन आ जाए हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

जो वैक्सीन लगाई जा रही है, क्या वह कोरोना के नए वेरीअंट से भी लड़ पाएगी?
इस सवाल का सीधा जवाब मुश्किल है, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि वैक्सीन लगाने के बाद हमारे शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ ऐंटिबॉडी तैयार हो जाएगी। शरीर में तैयार हुई ऐंटिबॉडी को जब भी कोरोना का नया वेरीअंट मिलेगा, तब बिना ऐंटिबॉडी वाले शरीर की तुलना में पहले से शरीर में मौजूद ऐंटिबॉडी वायरस से लड़ाई में काफी हद तक सक्षम होगी। वैसे यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि वायरस में जो म्यूटेशन हुआ है उसकी वजह से उसके जीनोम में किस स्तर तक बदलाव हुआ है। अगर बदलाव बड़ा है तब परेशानी हो सकती है, लेकिन इस तरह की गुंजाइश काफी कम होती है। ब्रिटेन और अफ्रीकी स्ट्रेन के लिए लगने वाला वैक्सीन पूरी तरह कारगर होगा या कुछ हद तक यह तो रिसर्च का विषय है, लेकिन पुराने स्ट्रेन के खिलाफ तैयार ऐंटिबॉडी हमारे लिए उपयोगी होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिए कोरोना की जो वैक्सीन आम लोगों को उपलब्ध हो रही है, उसे जरूर लगवाना चाहिए। न लगवाने की कोई वजह नहीं है।

ऐसा करेंगे तो नहीं होगा कोरोना…
इस बात को गांठ बांध लें कि मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और हाथों को साफ करने की आदत भूलनी नहीं है। इसे हम ‘न्यू नॉर्मल’ कह सकते हैं। जिस तरह बाइक या स्कूटी से कहीं आते-जाते समय हमारे लिए हेलमेट पहनना जरूरी है, उसी तरह मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग भी
जरूरी है। इनके बिना ज़िंदगी का सफर अधूरा और खतरे से भरा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here